Tuesday, December 20, 2005

भाग 19 : ये कैसी मुहब्बत

पत्रकारों के लिए रविवार का कोई खास मतलब नहीं होता। आमतौर पर उनकी छुट्टी नहीं होती (बॉसेज़ के अलावा) लेकिन रविवार को काम करने का एक फायदा यह ज़रुर होता है कि उस दिन अमूमन काम ठंडा रहता है। आदित्य के पास भी रविवार को दफ़्तर में ज्यादा काम नहीं रहता था। फोन पर गपियाना और एक दो छोटी मोटी ख़बरे दे देने भर से काम चल जाता था। उस दिन भी उसे ऐसी ही उम्मीद थी लेकिन दफ़्तर पहुंचते ही उसके आराम का कार्यक्रम भंड हो गया। न्यू डेली मॉर्निंग से अचानक इंटरव्यू के लिए फोन जो आ चुका था। वैसे तो आदित्य को इंटरव्यू देने में कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन उसे पॉलिटिकल बीट चाहिए थी,लिहाजा वो थोड़ी तैयारी करना चाहता था।
"सर, आज मेरा ऑफ नहीं है और ऑफिस में मेरे पास बहुत काम है। मेरे कुछ साथी भी छुट्टी पर हैं। अगर आप इंटरव्यू कल अरेंज करा दें तो बहुत मेहरबानी होगी।" आदित्य ने न्यू डेली मॉर्निंग के दफ़्तर में फोन कर संबंधित शख्स से गुजारिश की।
आदित्य को जैसी उम्मीद थी, वैसा ही हुआ। उसका इंटरव्यू सोमवार को रखवा दिया गया। आदित्य ने फौरन दफ़्तर में बहाना बनाकर छुट्टी ली और वहां से घर की तरफ रवाना हो लिया।
लेकिन,आदित्य को नहीं मालूम था कि पत्रकारिता की दुनिया उससे भी छोटी है,जितनी वो सोचता है। आदित्य ने दफ़्तर से बाहर कदम रखा ही था कि उसके मोबाइल की घंटी घनघना उठी। मीना ठाकुर का फोन था। मीना आमतौर पर आदित्य को फोन नहीं करती थी। ज़रुरत के वक्त आदित्य ही मीना को फोन किया करता था लेकिन आज अचानक ?
आदित्य को समझ नहीं आया। "जी मैडम, कैसे याद किया आपने। "
क्या आदित्य,कहां हो तुम। फौरन मेरे घर आ जाओ। मीना से लगभग आदेश कर डाला।
मरता क्या न करता। नई नौकरी का इंटरव्यू भर था,कोई ऑफर लैटर लेने नहीं जाना था,जो आदित्य मीना सरीखी कद्दावर सीनियर को इंकार कर देता। उसकी नयी नौकरी अभी पक्की नहीं थी,सो वो मीना ठाकुर के घर की तरफ चल पड़ा।
"कितने मिल रहे हैं तुम्हें वहां " मीना ने आदित्य को बैठाने के बाद सीधे सीधे सवाल कर डाला।
आदित्य हतप्रभ। ठगा सा। अभी तो इंटरव्यू हुआ भी नहीं है कि मीना के पास खबर पहुंच गई, कैसे?
"मैडम, अभी तो इंटरव्यू भी नहीं हुआ है। और फिर, मेरा वहां इंटरेस्ट पैसे की वजह से नहीं है।" आदित्य ने सधे शब्दों में जबाव भी दे दिया।
"मैं जानती हूं तो वहां पॉलिटीकल बीट चाहते हो।लेकिन,बरखुरदार राजनीति इतनी आसान नहीं है। लेकिन,सोचो वो नया अखबार है।पहली बात तो यह कि तुम खबर निकाल नहीं पाओगे और निकाल भी लीं तो उन्हें पढ़ेगा कौन। यहां एजुकेशन बीट पर तुम्हारी खबरें खूब पढ़ी जाती है।"
"मैम, मैं दावे तो नहीं करना चाहता लेकिन अगर मौका मिलेगा तो खबरों की कमी नहीं होने दूंगा। और आगे बढ़ने के लिए रिस्क तो लेना ही पड़ता है।"
मीना को भी अब सवाल-जबाव में मज़ा आने लगा था। " तो तुम पॉलिटीकल रिपोर्टर बन कर रहोगे? "
"मैम,मुझे लगता है,मेरी राजनीतिक समझ ठीक ठाक है और मुझे मौका चाहिए।"आदित्य ने फिर सधा हुआ जवाब दिया।
हालांकि, मीना ने संजीव के कहने पर आदित्य को रोकने की कोशिश करने बुलाया था। दरअसल, वो आदित्य को जताना चाहती थी कि उसे राजनीतिक समझ बिलकुल नहीं है,सो उसे चुपचाप एजुकेशन बीट ही देखनी चाहिए।लेकिन,आदित्य के जोश को देखकर उसे अच्छा लगा।उसे शुरुआती दौर की अपनी पत्रकारिता भी याद हो आई।
मीना ने आदित्य के उजले चेहरे को एक पल के लिए निहारा। उसे आत्मविश्वास से लबरेज चेहरा अच्छा लगा।
"आदित्य, मैं तुमसे वादा तो नहीं करती लेकिन अगर मैं तुम्हें अपने अखबार में ही पॉलिटिकल रिपोर्टिंग दिला दूं तो क्या तुम अपना फैसला बदल दोगे। "
"मैम, नेकी और पूछ पूछ। मैं आपका गुलाम हो जाऊंगा। "
"चलो ठीक है। तुम इंटरव्यू छोड़ो। मैं तुम्हारा काम करवा दूंगी । इस बीच, तुम अपनी राजनीतिक समझ और विकसित करो।" मीना ने फिर आदेशात्मक लहजे में सलाह दी।
आदित्य ने राय ली, हां मे सिर हिलाया और मीना के घर से निकल पड़ा। एक पल के लिए उसे लगा कि मीना ने उसकी दिल की बात सुन ली। फिर एक पल के उसे लगा कि कहीं मीना उससे मुहब्बत तो नहीं करने लगी। फिर...एक पल के उसे लगा कि कहीं वो मीना को चाहने तो नहीं लगा है........?????