Monday, October 17, 2005

भाग 18 :शक की चिंगारी

पिछले कई दिनों के बाद अमिष ठीक वक्त पर घर लौटा था। मीना की छुट्टियां शुरु हो चुकी थी और आज उसका पहला दिन था। मीना की बहुत इच्छा थी कि वो अमिष के साथ कुछ वक्त साथ गुज़ारे। इसके लिए उसने मनाली जाने का कार्यक्रम बना रखा था। हालांकि,प्रोग्राम पर अमिष की मुहर लगनी बाकी थी लेकिन मीना को मालूम था कि अमिष उसके इस कार्यक्रम को भंड नहीं करेगा।
"ओ डार्लिंग, टुडे यू हैव कम वेरी अरली। तुम्हें शायद याद था कि आज से मेरी छुट्टियां शुरु हो रही हैं।"
मीना ने दरवाजे पर अमिष को खड़ा देखकर सबसे पहले यही प्रतिक्रिया दी। लेकिन अमिष के चेहरे पर पर हमेशा की तरह चमकने वाली क्लोजअप मुस्कान न देखकर मीना ने अपनी बात थोड़ी बदल दी।
"क्या हुआ डार्लिंग। व्हाट हैपन। तुम कुछ उदास दिख रहे हो। "
"नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। कुछ थक गया हूं।" अमिष ने हड़बड़ाते हुए जवाब दिया।
अमिष ने मीना को चाय बनाने को कहा और सोफे पर बैग पटक कर बाथरुम की तरफ चल दिया। अमिष के इस व्यवहार ने मीना को यकीं दिला दिया कि कुछ गड़बड़ तो ज़रुर है।
"चलो, जनाब का मूड सही कर देते हैं।" मीना ने चाय का प्रोग्राम छोड़ कर फ्रीज में रखी बीयर निकाल दी। कमरे की बत्तिया बुझा दी और कैंडेल लाइट का इंतजाम कर दिया गया। कुछ ही पल में कमरे में रोमानी संगीत भी मद्धम मद्धम गूंजने लगा।
अमिष ने बाथरुम से बाहर बैडरुम में कदम रखा तो बदले माहौल को देखकर चौंक गया। लेकिन, एक ही पल में उसे मीना के इरादों का पता चल गया। मीना अमिष के गलों में अपनी बांहों का हार पहना चुकी थी। इससे पहले अमिष कुछ पहल करता, मीना ने अमिष के गीले होंठों पर अपने गर्म होंठ रख दिए।
मीना के लबों को चूमते ही अमिष भी अपनी उदासी कहीं कूढ़े के ढेर में फेंक कर उत्तेजित हो उठा। हालांकि, मुहब्बत का खेल शुरु हो चुका था लेकिन अचानक न जाने उसे क्या सूझा कि उसने मीना को एक झटके में अलग कर बिस्तर पर बैठा दिया।
मीना को समझ नहीं आया कि अचानक अमिष को क्या हो गया। इससे पहले वो कुछ समझ पाती, अमिष की चंद पंक्तियां उसे यादों के आगोश में ले जाने लगीं।
अमिष ने गुनगुनाना शुरु कर दिय था-
एक ख्वाब
सांझ से भोर तले
मेरी पलकों को घेरे रहता है
कि
तुम हो शांत निश्चल
आगोश में मेरी
और
मैं आनंदित निर्लिप्त हूं तुझमें
मौन दे रहा है पहरा
और शब्द छटपटा रहे हैं
मिलन की परिधि में आऩे को
पर हमारे मिलन की सीमा के भीतर
शब्दों के लिए जैसे कोई स्थान ही नहीं
जब कभी
मेरी धड़कनों को सुनकर
तुम अपनी बिखरी हुई जुल्फों को बनाने
मेरे कंधे से सिर उठाकर
मेरे चेहरे के सामने
अपना चेहरा लाती हो,तब
शब्द चंचल होकर
अपना स्थान खोजने लगते हैं
लेकिन तब
मेरे अधर तुम्हारे अधरों से
बातें करने लगते हैं
मौन तब भी देता है पहरा
और
शब्द तब भी अपना अस्तित्व खोज रहे होते हैं।
"कहो कैसी लगी" अमिष ने शरारत भरे अंदाज में मीना से पूछा।
"तुम्हें अभी तक याद है ये कविता। चार साल हो गए। तुमने बार किस किया था मुझे और उसके बाद अगले दिन ऑफिस में मेरे हाथों में ये कविता थमा दी थी। मैंने संभाल कर रखी है। " कविता सुनकर मीना तो एक पल के लिए भावुक हो गई। वासना का ज्वार अचानक ठंडा पड़ रहा था और निश्चल प्रेम की चिंगारी फिर फूटने लगी थी। अमिष ने भी मीना की नम होती आंखों को देखकर उसे बांहों में भर लिया। कई दिनों बाद दोनो के बीच प्यार तो था, लेकिन एक दूसरे को पाने की हवस कहीं नहीं थी।
इस खामोशी को अमिष ने तोड़ा- "क्या मैडम, आज खाना खिलाने का प्रोग्राम नहीं है क्या"
मीना ने धीरे से अपनी नम आँखों को पोंछा और मुस्कुराते हुए बोली-"क्यों नहीं। आज तो खास प्रोग्राम है।"
मुहब्बत भरे इस माहौल में अचानक बजी घर की डोर बेल दोनों को कर्कश सी जान पड़ी।
"रात के दस बज रहे हैं, कौन आ सकता है इस वक्त"। मीना ने अमिष से सवाल किया।
अमिष ने दरवाजा खोला तो दंग रह गया। सामने रश्मि खड़ी थी। रश्मि पाठक। अमिष को क्षण भर के लिए समझ नहीं आया कि वो उसे देखकर मुस्कुराए या दरवाजा बंद कर ले।
अमिष इससे पहले कुछ कहता- मीना दरवाजे पर पहुंच चुकी थी। मीना ने आँखों ही आंखों में रश्मि का अभिवादन किया लेकिन रात के दस बजे पहली बार इस नये चेहरे को देखकर मीना हैरान थी।
"हाय अमिष, दरअसल, मैं यहां से गुज़र रही थी तो सोचा कि कल के स्पेशल प्रोग्राम के बारे में तुमसे डिस्कस कर लूं। आज ज्यादा वक्त नहीं मिल पाया था।" रश्मि ने दरवाजे के बाहर खड़े खड़े ही धीरे से अपनी बात रखी।
लेकिन, अमिष के चेहरे का उड़ा रंग देखकर मीना भांप चुकी थी कि रश्मि के घर आने का मकसद सिर्फ कार्यक्रम के बारे में चर्चा करना भर नहीं था। इसकी तह में कुछ और बात ज़रुर थी। मीना ने रश्मि से बैठने को कहा और भीतर जाकर इंतजार करने लगी कि कब रश्मि जाए और वो अमिष के चेहरे के उड़े रंग की असल वजह जान सके।

Tuesday, October 04, 2005

भाग 17 : मयकशी में खुशी

दिल्ली के पटेल नगर इलाके एक एलआईजी फ्लैट में महफ़िल सजी थी। यहां चार मयक़श जमे थे और मय, मीना, सागर सबका इंतज़ाम किया गया था। कमी थी तो बस साक़ी की। जितेन्द्र ने शहर में ड्राई डे होने के बावजूद दिल्ली-यूपी बॉर्डर से दारु की जुगाड़ की थी। दरअसल, आज की महफ़िल का बस एक मकसद था- चापलूसी। चापलूसी केकेके की। हालांकि, जितेन्द्र ने केकेके को एक कमसिन कली मुहैया कराने का वादा किया हुआ था लेकिन आज के लिए सिर्फ दारु का कार्यक्रम था। जितेन्द्र को चापलूसी का पहला फंडा बखूबी पता था। वो ये कि, जिसकी लल्लो चप्पो कर रहे हो, उससे बार बार मिलो। मिलने के बहाने खोजो। बस, इसी लाख टके के सिद्धांत पर अमल करते हुए जितेन्द्र ने पहली बार में सिर्फ जाम छलकाने की ही व्यवस्था की थी। केकेके के अलावा जितेन्द्र के दोनों साथी भी महफिल में मौजूद थे।
"केकेके ने पहला घूंट लेते हुए ही जितेन्द्र को शाबाशी दे डाली। वाह, मज़ा आ गया। एक तो ड्राई डे और उस पर इतनी धांसू दारु...मज़ा आ गया।"
महफ़िल में बैठे चारों शराबी आदतन शराबी नहीं थे। कुछ ऐश के तो कुछ तेश के दारुबाज थे। रोज़ नहीं पीते थे, इसलिए पीने का पूरा आनंद लेकर पीते थे।
केकेके की शाबाशी से खुश जितेन्द्र के हौंसले भी बुलंद थे। "सर, अभी तो ये शुरुआत है, थोड़ी देर में आप ज़न्नत में पहुंच जाएंगे। "
"क्या करेंगे,ज़न्नत में पहुंचकर गुरु, अगर वहां अप्सराएं ही न हो? " केकेके ने सवाल उछाल दिया।
जितेन्द्र ने केकेके को भरोसा दिलाया कि अप्सरा की खोज जारी है और जल्द ही उन्हें उसके दर्शन करा दिए जाएंगे। केकेके को भी इस बात की कोई जल्दबाजी नहीं थी। छलकते जामों के बीच तीनों केकेके को अपने अपने अंदाज़ में खुश करने मे जुटे थे। केकेके की तारीफों के पुल बांधे जा रहे थे और उनकी महानता के ज़िक्र में कई रिकॉर्ड ध्वस्त हो रहे थे। मेहमाननवाजी से खुश केकेके भी खुश हो लिए थे। बातों का दौर जारी था और केकेके अपने मूड में आ चुके थे।
"तुम लोग हस्तमैथुन करते हो क्या? " केकेके की तरफ से अचानक उछाले गए इस सवाल से तीनों हतप्रभ थे।
केकेके ने तीनों के चेहरों को पढ़ा और कहा-"अरे यार, तुम लोग इतना परेशान क्यों हो गए। अब करते हो तो बोलो नहीं तो छोड़ों। लेकिन मैं तो अभी भी हैंड प्रैक्टिस करता हूं। यार......औरत के साथ कितना भी बिस्तर गर्म कर लो... हैंड प्रैक्टिस का मज़ा कुछ और ही है। "
केकेके के सिर पर सुरूर हावी हो चुका था और वो सेक्स से जुड़े अपने तमाम अनुभवों को चटखारे लेकर बताने लगा। जितेन्द्र और उसके दोनों साथी भी अब इस बातचीत में शामिल हो चुके थे।
मयकशी के दौर के बीच इतनी रंगीन वार्ता में विघ्न पड़ा.....केकेके के मोबाइल के घंटी से। केकेके का नंबर को घूरा और काट दिया। लेकिन,दो पल बाद मोबाइल फिर घनघना उठा। इस बार, केकेके ने गुस्से भी फोन ऑन किया और कहा- कौन है?
लेकिन,दूसरी तरफ से आई आवाज़ ने केकेके के पैरों तले ज़मीन खिसका दी।
"मैं विशंभर नाथ बोल रहा हूं। कहां रहते हो तुम। कुछ पता भी रहता है तुम्हें। "हमारा हिन्दुस्तान" के पटना एडिशन के लिए संपादक के लिए अजय कुमार का नाम फाइनल हो गया है।"
विशंभर की इस सूचना के बाद केकेके का सुरुर लापता हो चुका था और बदन में अजीब सी फुर्ती आ गयी। वो उठ खड़ा हुआ और चीते की चाल से नीचे उतर लिया।....
सिर्फ इन्हीं शब्दों के साथ...."कल बात करता हूं तुम लोगों से"