Friday, September 23, 2005

भाग 16 - प्यार पर तलवार

अमिष अंडमान के टूर से लौटा तो एयरपोर्ट से सीधे घर पहुंचा। रश्मि को लेने उसके घरवाले आए थे, जबकि कैमरामैन सारा ताम-झाम लेकर दफ़्तर रवाना हो गया था। रात का सन्नाटा सनन-सनन बोल रहा था और इस सन्नाटे को तोड़ती दो-चार कुत्तों के आपसी वार्तालाप की आवाज़ रह-रहकर गूंज रही थी। इसी सन्नाटे के बीच अमिष चोरों की तरह घर में घुसा तो घड़ी की सुईयां चार के आकंडे के साथ गुत्थम-गुत्था थी। अमिष के पास घर के एंट्रेस गेट की दूसरी चाबी हमेशा रहती थी, लिहाज़ा घर में घुसने में उसे कोई परेशानी नहीं होनी थी। शायद इसलिए, उसने मीना को भी अपने आने की सूचना नहीं दी थी।

अमिष ने धीरे से बेडरुम के दरवाजे को खोला तो नाइट लैंप में भी उसे मीना की मादकता गज़ब ढ़ाती दिखी। आमतौर पर नाईटी पहनकर सोने वाली मीना सिर्फ़ ब्रा और बारमूडा में सोयी हुई थी। हालांकि, बिस्तर पर पड़ा गीला टॉवेल साफ बता रहा था कि वो रोज़ की तरह आज भी देर से सोयी थी। अमिष का मन तो हुआ कि उसे बांहों में भरकर जगा दे...लेकिन जिस्म की आग बुझाने से पहले उसने पेट की आग बुझाना ज़रुरी समझा।

अमिष ने फ्रीज में रखी बीयर के एक दो घूंट मारकर खाने के लिए कुछ टटोला तो उसे मिली.....? कामयाबी। अमिष को रायता और चावल पसंद थे और उसने इसी से अपनी भूख मिटाई। अमिष चेन्नई एयरपोर्ट पर अच्छी खासी नींद ले चुका था, इसलिए उसे नींद तो नहीं आ रही थी लेकिन थकान ज़रुर थी। अमिष ने अपना टॉवेल उठाया और बाथरुम की ओर बढ़ गया।

अमिष के लिए अंडमान का टूर शानदार रहा था। एक तो,अंडमान पर इस तरह की ट्रैवल सीरिज़ उसे पहली बार मिली थी, जिसे उसने बखूबी अंजाम दिया और दूसरा रश्मि पाठक। अमिष दस दिन के टूर के दौरान ही रश्मि के काफी नज़दीक आ चुका था। रश्मि के साथ जारवा की झोपड़ी में शुरु हुआ अफ़साना एक बार होटल के कमरे तक भी पहुंच चुका था। .......अमिष को एक पल के लिए पोर्ट ब्लेयर के होटल के कमरे में रश्मि के साथ साथ नहाना याद आ गया। अमिष ने मुस्कुराते हुए बाथरुम का दरवाजा बंद किया और नहाने बैठ गया।

हालांकि, सुबह के पांच बज चुके थे लेकिन अमिष और मीना, दोनों के लिए ही ये रात का वक्त था। पिछले कई साल से दोनों "इस वक्त " मुर्गे और उसकी बाग़ को चुनौती देते हुए खर्राटे लेने का रिकॉर्ड बनाते रहे थे, लेकिन घड़ी में सुबह के पांच बजते देखकर अमिष को कुछ अजीब से खुशी हुई। अमिष का एक पल के लिए मन हुआ कि वो चाय बनाए और मीना के पास ले जाकर कहे- Madam, Your bed tea is ready. Just wake up । अमिष ने सोचा, खिड़की से झांकती भोर की हल्की रोशनी के बीच दोनों चाय पीते हुए गप्पे मारें और पिछले दस बारह दिनों का हाल-चाल पूछें। लेकिन, तभी अमिष के दिमाग में जुल्फें खोलकर सिर्फ ब्रा पहले बिस्तर पर पड़ी मीना का चित्र उभर आया। अमिष ने ड्रांइगरुम की लाइट ऑफ की और पहुंच गया " काम करने "।

.....................अमिष ने बेड रुम के नाइट लैंप को भी आराम दे दिया और चोर तरीके से मीना के बदन से खेलने लगा। मीना की ब्रा गिर चुकी थी । अमिष ने अपनी अप्सरा के होठों से होंठ लगा दिए। मीना की नींद खुली गयी थी लेकिन वो अमिष के बदन की खुशबू पहचानती थी। मीना को भी काम क्रीडा में मज़ा आ रहा था लेकिन आज वो बेकफुट पर रहकर ही खेल का मज़ा लेना चाहती थी।....

घड़ी के दोनों कांटे तेज़ी से दौड़ लगा रहे थे और उसी तेज़ी से अमिष भी अपने "काम" को अंजाम देने में जुटा था लेकिन इसी दौरान बजी अमिष के मोबाइल की घंटी ने उसे बेकाबू कर दिया।......चंद सेंकेड बाद बदहवास से अमिष ने मोबाइल उठाया तो दूसरी तरफ से आवाज़ आई- हैलो सर, आई एम रश्मि हीयर.वेरी गुडमॉर्निंग। मुझे मालूम था कि अभी आप सोए नहीं होंगे।"

"हैलो रश्मि " अमिष ने धीरे से बुदबुदाया लेकिन मीना के कान तो मानो अपने सबसे बड़े दुश्मन का नाम सुनने को बेकरार थे। मीना के तन की आग बुझाए बिना बिस्तर से उठना अमिष को भारी पड़ने वाला था। अमिष मीना के स्वभाव से अच्छी तरह वाकिफ था, लिहाजा मीना के "कुछ भी " करने से पहले उसने फोन काटकर स्विच ऑफ कर दिया।

2 Comments:

At 1:45 PM, September 28, 2005, Anonymous Anonymous said...

Puru sahab,

Your novel is going good. This is the first time I am reading a hindi novel and I really liked it. At this time you have prepared the story ground and I am anxious to know what happens next.

Please excuse me as I do not know how to post comments in hindi from this comment box but keep up the good work.

 
At 7:16 AM, September 30, 2005, Blogger manjeet said...

great work keep it up

 

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