Thursday, September 15, 2005

भाग 14 : के के के

दिल्ली की फिज़ा में जहां इन दिनों डेली न्यू मॉर्निंग अख़बार के चर्चे ज़ोरों पर थे, वहीं कुछ पत्रकारों के बीच हिन्दी के एक बहुत बड़े पत्र "हमारा हिन्दुस्तान " के पटना एडिशन शुरु होने की भी सरगर्मियां तेज़ थीं। "हमारा हिन्दुस्तान " देश का जाना माना अख़बार था और उसके नए संस्करण को लेकर हिन्दी पत्रकार बिरादरी खासी उत्सुक थी। दरअसल, दिल्ली में बिहार से आए पत्रकारों की अच्छी खासी फौज है। इनमें कुछ यहां आईएस बनने का सपना लिए पहुंचे तो कुछ मजबूरीवश लेकिन जब सपनों पर हकीकत का हथौड़ा पड़ा तो पत्रकार बन गए। ये बेहद रोचक तथ्य है-भारत में खासकर उत्तर भारत में आमतौर पर कहा जाता है कि जो कुछ नहीं बन पाता वो टीचर बन जाता है। इसी तर्ज पर पत्रकारों का भी उदाहरण दिया जा सकता है। खासकर हिन्दी पत्रकारों का। जो कहीं तोप न मार माए, दुनिया से डर जाए, आशिकी में लुट जाए, महबूबा के बाप-भाई से पिट जाए वो हिन्दी का पत्रकार बन जाए। इसे हिन्दी पत्रकारिता जगत की त्रासदी कहिए या बड़प्पन, लेकिन सच यही है कि हिन्दी का पत्रकार बनने के लिए किसी खास योग्यता की दरकार नहीं है। अगर सीधे सीधे शब्दों में कहें तो हिन्दी पत्रकार बनना बेहद आसान हैं अलबत्ता योग्य हिन्दी पत्रकार बनना उतना ही मुश्किल है, जितना आईआईटी या आईएस की परीक्षा पास करना।
भई, जब हर गली-कूचे से हिन्दी में कथित योग्य पत्रकारों की फौज निकल रही हो, ऐसे में एक नया संस्करण शुरु होना तो जश्न का मौका ही है। लिहाजा, पटना जाने के इच्छुक पत्रकार बिरादरी अपनी जुगाड़ सैट करने में जुट गई कि कौन सा बंदा उन्हें पटना की रेलगाड़ी में बैठा सकता है।
इसी सोचविचार में उलझे छपरा, हज़ारीबाग और पटनावासी तीन पत्रकार प्रेस क्लब में बैठे समाधान खोज रहे थे कि अचानक जितेन्द्र कुमार झा के चेहरे पर बिजली सी चमक दौड़ पड़ी। के के के .........। जितेन्द्र "वीर भारत " नाम के एक चिरकुट किस्म के अख़बार में सब एडिटर था लेकिन खुद को टाइम्स ऑफ इंडिया के एडिटर से कम समझना उसकी फितरत में नहीं था। लेकिन, चिरकुट अख़बार था, लिहाजा उसकी तनख़्वाह महज़ छह हज़ार रुपये ही थी। थोड़े बहुत गड़बड़झाले कर तीन-चार हज़ार रुपये और कमा लेता था। जाहिर है, जितेन्द्र की जेब हमेशा हल्की रहती थी। यही हाल उसके बाकी दो साथियों का भी था। ऐसे में केकेके का नाम सुनकर तीनों को कुहासे में किरण दिखायी दी। केकेके यानि कैलाश कुमार कांग। हिन्दी पत्रकारिता में जनाब का आगमन अपने पिता जी की वजह से हुआ था। केकेके के पिता "हमारा हिन्दुस्तान " के दिल्ली संस्करण में कई साल तक संपादक रह चुके थे। केकेके ने पत्रकारिता में पिता की विरासत यानी कलम तो संभाल ली थी लेकिन उसमें वो धार नहीं आ सकी थी। साथ ही, चरित्र के मामले में भी केकेके का विलक्षण व्यक्तित्व था। इन्हीं "खूबियों" की वजह से केकेके को निकट से जानने वाले लोग कुत्ता कमीना काईंयां भी कहा करते थे।
बहरहाल, केकेके की योजना पटना एडिटन में स्थानीय संपादक बनने की थी और इसके लिए वो वहां अपने कुछ पिट्ठू भेजने की जुगाड़ में था। जितेन्द्र को इस बात की भनक थी और वो केकेके को खुश करने के उपाय भी जानता था, लिहाज़ा प्रेस क्लब में बैठे बैठे ही उसने केकेके को मोबाइल पर फोन घनघना दिया।
"हैलो सर, जितेन्द्र बोल रहा हूं, वीर भारत से।"
"हां, जितेन्द्र, क्या हाल हैं। कैसे हो? "
"बस सर, गुज़र रही है जिंदगी। आपकी शरण में आना चाहते हैं लेकिन आप कहां भक्तों की सुनते हैं। "
"अरे नहीं यार, आजकल कुछ व्यस्त हूं। एक नए प्रोजेक्ट में लगा हूं। बस..... "
"सर, आप तो हमेशा व्यस्त ही रहते हैं। एक दिन का समय निकालें तो आपका चेला आपकी सेवा कर दे। एक बहुत बढ़िया चीज़ नज़र मे है मेरे। "
इससे पहले केकेके कुछ कहता, जितेन्द्र ने ब्रह्मास्त्र चला दिया- "सर, मना मत कीजिएगा। संडे को तो आप फ्री रहते होंगे, उसी दिन वक्त निकाल लीजिए। बंदे पर विश्वास कीजिए --दिल खुश हो जाएगा।.....मैं आपको लेने आ जाऊँगा सर। ओके सर, भक्त को आज्ञा दें। "
जितेन्द्र ने इतना कहते हुए फोन काट दिया। जितेन्द्र को पूरी उम्मीद थी कि केकेके का कमीनापन कमसिन कली के आगे काफूर हो जाएगा।

4 Comments:

At 3:52 AM, September 16, 2005, Blogger Punit Pandey said...

bahut khoob. Ab aur kitne characters aana baki hain?

 
At 9:48 PM, September 16, 2005, Blogger Raviratlami said...

अच्छे प्रयास के लिए बधाई स्वीकारें.

ऑपेरा ब्राउज़र में आपका गूगल एडबार पाठ को ढंकता है. उसे कहीँ और लगाएं तो अच्छा होगा.

 
At 6:32 AM, September 19, 2005, Anonymous Anonymous said...

why i am only seeing lines no words do i have download any fonts even though i have baraha on my computer

 
At 6:36 AM, September 19, 2005, Blogger manjeet said...

what about fonts do i need it even though i ahve baraha on my system

 

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