Sunday, September 04, 2005

भाग 13: झोपड़ी में सनसनी

अंडमान और निकोबार में शूटिंग का दौर शुरु हो चुका था। हालांकि, अमिष को छह दिन में तीनों एपिसोड़ की शूटिंग खत्म कर देनी थी लेकिन अंडमान की ख़ूबसूरती और ख़ूबसूरत रश्मि के साथ के चलते उसने अपना कार्यक्रम दो दिन और बढ़ा दिया। अमिष ने तय किया कि वो तीनों एपिसोड़ के अलावा एक खास एपिसोड़ अंडमान की आदिवासी जनजाति ज़ारवा पर भी बनाएगा। रश्मि ने भी उसकी इस योजना का उत्साह के साथ समर्थन किया। अमिष ने तय किया कि दिल्ली जाने से ठीक एक दिन पहले पोर्ट ब्लेयर से तीस किलोमीटर दूर उस समुद्र तट पर जाया जाएगा,जहां जारवा जनजाति के कुछ सदस्य देखे जा सकते हैं। उम्मीद के मुताबिक प्रशासन से अनुमति मिल गयी और जिलाधिकारी ने उनकी लिए एक सुरक्षा गार्ड भी मुहैया करा दिया।
"क्या जारवा जनजाति के लोग बिलकुल कपड़े नहीं पहनते हैं? रश्मि ने अमिष से पूछा। " रश्मि और अमिष इस खास आदिवासी पर एक स्पेशल कार्यक्रम की रुपरेखा लिए चल पड़े थे कि रश्मि के इस सवाल ने अमिष को एक पल के लिए असहज कर दिया।
"सुना तो है। देखा नहीं है। वो नंगे हो सकते हैं क्योंकि आदिवासी हैं पर तुम क्यों शरमा रही हो। " अमिष ने रश्मि के सवाल का जवाब उसकी झिझक में तलाश लिया।
हालांकि, कार में अमिष और रश्मि के साथ रामसिंह नाम का सुरक्षा गार्ड भी मौजूद था लेकिन अंग्रेजी में हुई इस संक्षिप्त बातचीत का रामसिंह पर कोई असर नहीं था। साफ था कि रामसिंह का अंग्रेजी में हाथ थोड़ा कमज़ोर था। अमिष ने इसे भांपते हुए इंग्लिश में ही रश्मि से पूछ डाला कि क्या वो नग्न आदिवासियों को शूट कर पाएगी और क्या उनके बारे में एंकरिंग करते हुए वो शरमाएगी नहीं?
रश्मि के नो कहते ही रामसिंह ने कहा-"यस। यस सर, यहीं गाड़ी रोक कर पार्क कर दीजिए। यहां से हमें पैदल चलना पड़ेगा। आदिवासी यहां से कुछ ही दूरी पर रहते हैं।" अमिष ने गाड़ी पार्क की और रश्मि को कैमरा यूनिट साथ लेकर चलने को कहा। इस बीच, रामसिंह ने अमिष को आदिवासियों के झोपड़ीनुमा घर दिखाए। अमिष ने उन्हें देखने की इच्छा जाहिर की तो रामसिंह ने ये कहकर मना कर दिया कि जारवा जनजाति हिंसक होती है और वो हमला कर सकती है। रामसिंह की बात सुनकर रश्मि को तो एक पल के लिए सांप सूंघ गया। अमिष ने रश्मि को कैमरा बाहर निकालने का निर्देश दिया और दोनों को आगे चलने के लिए कहा। हालांकि, अमिष को पता था कि जारवा हिंसक होते हैं लेकिन वो उनके घर के भीतर के नज़ारे को अपने कैमरे में कैद करने को बैचेन था। अमिष ने कैमरा उठाया और धीरे से झोपड़ियों की तरफ बढ़ चला। झाड़ियों के बीच बनी छोटी छोटी झोपड़ियों से महज आठ-दस फीट की दूरी पर खड़ा अमिष पूरी तरह चौकन्ना था लेकिन तभी कंधे पर चुभे नाखूनों ने उसके होश फाख्ता कर दिए। एक क्षण को उसे लगा कि वो आदिवासियों के कब्जे में आ चुका है। एक पल के तो उसे किसी फिल्म का सीन भी याद हो आया, जिसमें आदिवासी उला..उला...उले गाते हुए अपने शिकार को आग के पास बांधकर रख देते हैं। लेकिन, ये क्या? न कोई जारवा,न आग , न उसकी गर्मी, पीछे थी तो बस केवल रश्मि।
अमिष ने रश्मि को डांटना चाहा लेकिन आदिवासियों के आसपास होने की आशंका के चलते वो चुप रहा।
अमिष ने रश्मि का हाथ पकड़ा और धीरे से झोपड़ियों की तरफ बढ़ा। चार फीट की दूरी पर पहुंचने के बाद भी जब उन्हें कोई आहट नहीं सुनाई दी तो दोनों का हौंसला बढ़ गया। अमिष ने रश्मि का जोर से हाथ पकड़ा और एक झटके में दोनों झोपड़ी के भीतर पहुंच गए।
हालांकि, अमिष और रश्मि जारवा जनजाति के घरों का मुआयना करने वहां जा पहुंचे थे, जहां शायद कभी कोई पत्रकार नहीं पहुंचा था। लेकिन,इस दौरान एक ऐसी घटना हुई जो रश्मि और अमिष दोनों के साथ कभी नहीं हुई थी। वो ये कि दोनों अंदर घुसे तो छोटे से प्रवेश द्वार में एक साथ घुसने के चक्कर में आपस में ही टकरा गए और फिर अंदर रश्मि नीचे-अमिष ऊपर।
अमिष और रश्मि दोनों के लिए ये पल अप्रत्याशित था लेकिन इस शानदार मौके को अमिष हाथ से नहीं जाने देना चाहता था। रश्मि के गुलाबी होंठों को इतने पास से देखने का मौका उसे पहले कभी नहीं मिला था। रश्मि ने दो पलों के इस घटनाक्रम पर अपना कोई विरोध नहीं जताया तो अचानक अमिष का हौंसला बुलंद हो गया। अमिष ने रश्मि को कसकर पकड़ा और उसे किस कर लिया।
.....अब....झोपड़ी में सनसनी थी....एक नए उन्माद की सनसनी।

2 Comments:

At 3:50 AM, September 06, 2005, Blogger Jitendra Chaudhary said...

बहुत सही गुरु, काफ़ी सनसनी फ़ैला दी है.

आगे की सरगर्मियों का इन्तज़ार रहेगा.

 
At 5:31 AM, August 23, 2006, Blogger M. K. Malviya said...

Excellent guru. its different feel of lust in danger place.

 

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