Wednesday, August 31, 2005

भाग 12 : आदि के ख़्वाब

इंडियन टाइम्स के दफ़्तर में पिछले दो दिनों से सिर्फ़ एक ही बात की चर्चा थी। वो थी- डेली न्यू मॉर्निंग नाम के एक अख़बार की। दरअसल, डेली न्यू मॉर्निंग नाम से एक नया अखबार दिल्ली और मुंबई में लांच होने वाला था। एक बड़े उद्योगपति राजाभाई ओबेराय के इस अख़बार के लिए भर्तियों का विज्ञापन दो दिन पहले ही शहर के सभी अख़बारों में प्रकाशित हुआ था। ओबेराय समूह स्टील,पेट्रोल और केमिकल्स के क्षेत्र में देश के अग्रणी व्यवसायी प्रतिष्ठानों में से एक था। हालांकि, मीडिया में इस समूह की दखल न के बराबर थी लेकिन जानकार मानते थे कि मीडिया के क्षेत्र में ओबेराय समूह जल्द ही पैठ बना लेगा।वजह-पैसों का अकूत भंडार और उसे खर्च करने की दिलेरी भी। यदि डेली न्यू मॉर्निंग ने बेहतरीन पत्रकारों को दोगुनी-तिगुनी तनख्वाह पर दूसरे अख़बारों से तोड़ लिया तो कौन माई का लाल क्या कर लेगा ?
मिस्टर बैनर्जी ने भी यही तर्क देते हुए आदित्य के सामने डेली न्यू मॉर्ऩिंग के विज्ञापन वाला अखबार पटका। “बोलो बरखुरदार, अगर दिलचस्पी हो तो बात करूं तुम्हारे लिए इस अख़बार में।”
“लेकिन, दो दिन पहले तो भर्तियों का विज्ञापन आया है। आप किससे बात करेंगे? आदित्य ने मासूमियत से अपना सवाल उछाला। ”
“बेटा, भारतीय मीडिया की अच्छायी कहो या बुराई, लेकिन सच यही है कि यहां भर्तियां बायोडेटा देखकर नहीं की जातीं, कॉन्टेक्ट्स से होती हैं। तुम्हारा पीआर अच्छा है तो नौकरी छोड़ना और पाना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन अगर तुम्हारा पीआर अच्छा नहीं है तो एक नौकरी पानी के लिए खून-पसीना एक हो जाता है। और...तुम्हारी जानकारी के लिए मेरा पीआर अच्छा है।“
आदित्य ने मिस्टर बैनर्जी को अपलक देखा और फिर मन ही मन सोचा कि सिर से यू हीं ये बाल नहीं उड़े हैं अंकल।
मिस्टर बैनर्जी ने विज्ञापन का अख़बार वहीं छोड़ा और आदित्य को नयी जॉब का ऑफर देकर वहां से निकल लिए।
आदित्य को इंडियन टाइम्स में काम करते हुए अभी कुछ महीने ही गुज़रे थे,लिहाज़ा वो इतनी जल्दी नौकरी बदलना नहीं चाहता था।लेकिन मन ही मन उसकी इच्छा पॉलिटीकल बीट पाने की भी थी। इंडियन टाइम्स में मीना ठाकुर जैसी जबरदस्त पत्रकार तो थी ही, पुराना अख़बार होने की वजह से दूसरे कई पत्रकार भी राजनीतिक ख़बरें कवर करते थे। ऐसे में, आदित्य को यहां पॉलिटीकल बीट मिलने में कई साल लग सकते थे। आदित्य के लिए सिर्फ एक यही तर्क मिस्टर बैनर्जी को फोन मिलाने के लिए काफ़ी था।
भारतीय मीडिया में एक बड़ी दिलचस्प बात ये है कि यहां पॉलटिकल बीट को सबसे महत्वपूर्ण समझा जाता है। राजनीति का कखग भी नहीं समझने वाले तथाकथित पत्रकार राजनीतिक ख़बरे ही कवर करना चाहते हैं। भूमंडलीकरण के दौर में आर्थिक पत्रकारिता बहुत अहम हो चली है लेकिन अगर युवा पत्रकारों से पूछो तो पता चलेगा कि सभी राजनीतिक पत्रकारिता में तुर्रम खां होना चाहते हैं। आदित्य भी ऐसा ही तुर्रम खां बनना चाहता था। उसकी भी दिली इच्छा थी कि उसके फोन करने पर बड़े से बड़ा नेता लाइऩ पर आ जाए या उसके कहने भर से कई काम हो जाए। लेकिन, दूसरे तुर्रमों से वो इस मायने में अलग था कि उसे राजनीतिक समझ थी।
“ठीक है बरखुरदार। मैं कल बात करुंगा तुम्हारे लिए। ” आदित्य के फोन का मिस्टर बैनर्जी ने संक्षिप्त में यही जवाब दिया।
आदित्य ने अपना काम खत्म किया और ऑफिस से बाहर निकल लिया। मिस्टर बैनर्जी के अऩुभव में सिर से उड़े हुए बाल औऱ उऩका जबरदस्त आत्वविश्वास देखखर आदित्य को भी भरोसा हो चला था कि मिस्टर बैनर्जी एक बार फिर उसके लिए देवदूत साबित होंगे।

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