Wednesday, August 10, 2005

भाग नौ : पार्टी..डांस..मस्ती

ली मेरेडियन का सेंटर हॉल दुल्हन की तरह सजा था। पार्टी की रंगत साफ दिखायी दे रही थी। पार्टी में मौजूद ज़्यादातर लोगों के हाथों में जाम थे। खास बात ये कि शराब का सुरूर लोगों पर चढ़कर बोले,इसके लिए साकी का इंतज़ाम भी किया गया था। डांस फ्लोर पर तिल रखने को जगह नहीं थी।लोग जमकर नाच रहे थे और जो नाच नहीं रहे थे,वो दिल में किसी दिलकश सुंदरी को बांहों में लिए नाचने का ख्वाब देख रहे थे।
कजरारे कजरारे रे...तेरे कारे कारे नैना...........सदा में गूंजते इस तराने पर डांस फ्लोर पर लोगों की मस्ती देखने लायक थी कि अचानक संजीव श्रीवास्तव की मौजूदगी ने फ्लोर पर जगह पैदा कर दी। दरअसल, संजीव मीना का हाथ थामे फ्लोर पर पहुंच चुके थे।मीना खूबसूरत तो थी ही,लेकिन पार्टी के दिन मानो उसकी खूबसूरती को चार चांद लग गए थे।वो साड़ी पहन कर इतनी दिलकश लग रही थी कि वहां मौजूद कई कमसिन हसीनाओं को पसीना छूट रहा था। ऐसे में फ्लोर पर मीना ने जब अपनी बलखाती कमर के झटके दिखाए, तो देखने वाले दंग रह गए। लोगों को इस बात का कतई अंदाज़ नहीं था कि अपनी कलम से बड़े बड़ों के छक्के छुड़ाने वाली इस नाज़नीन को झूमना भी आता है। मीना ने ज़्यादा नहीं पी थी लेकिन डांस फ्लोर पर उसे नाचता देखकर यही लग रहा था कि जैसे उसने आज दिलखोल कर पी है। संजीव भी बस उसे ही देखे जा रहा था।
पार्टी की इसी तड़क भड़क के बीच एक 23-24 साल का नौजवान ऐसा भी था, जो हाथों में कोल्ड ड्रिंक का गिलास पकड़कर किन्हीं ख्यालों में खोया हुआ था। ऐसा मालूम होता था कि स्वर्ग की अप्सराओं की बीच या तो कोई संन्यासी था या नपुंसक। उसकी ख़्यालों के गाड़ी पर अचानक एक वेटर ने ब्रेक लगाया।
“कुछ लेंगे सर?”
“नो थैंक्स ”।24 साल के उस नौजवान ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। इस नौजवान का नाम आदित्य शर्मा था। इंडियन टाइम्स में ज्वाइन किए उसे अभी तीन महीने ही हुए थे। वो रिपोर्टर था और फिलहाल उसे एजुकेशन बीट का जिम्मा दिया गया था।
“क्या बात है आदित्य। किन ख्यालों में खोए हुए हो। मैं बहुत देर से देख रहा हूं, तुमने कुछ लिया भी नहीं।” न्यूज एडिटर दिलीप बैनर्जी ने आदित्य के पास से गुज़रते हुए पूछा।
“नहीं सर,ऐसी कोई बात नहीं है। ”
“देखो बरखुरदार,हम उड़ती चिड़िया के पंख गिन लेते हैं।तुम तो अभी उड़ना भी नहीं सीखे हो।”
दरअसल, दिलीप बैनर्जी ही वो शख्स थे, जिन्होंने आदित्य का सीवी संजीव श्रीवास्तव को दिया था।दिलीप आदित्य के पिता के अच्छे दोस्तों में थे और आदित्य के पिता के निधन के बाद से उसके परिवार का हाल चाल लेते रहते थे।
“सर, एक उलझऩ थी। उसी से जूझ रहा था। लेकिन,ये वक्त उस पर बात करने का नहीं है।मैं आपसे कल बात करुंगा।आज आप पार्टी इन्जॉय कीजिए” आदित्य ने दिलीप बैनर्जी के सभी सवालों को यही जवाब दिया।
उधर,डांस फ्लोर पर तापमान लगातार बढ़ रहा था। मीना की ज़ुल्फें खुलकर बिखर चुकी थीं और पसीने से तर-बतर संजीव का कोट हवा में लहराने के बाद एक जूनियर सब एडिटर के कंधों की शोभा बढ़ा रहा था।
मस्ती का समां रुका तो घड़ी रात के ढ़ाई बजा चुकी थी। कुछ खबरनवीस टल्ली होकर सोफे-कुर्सी पर जम गए थे,तो कुछ किसी का दामन पकड़े घर जाने की जुगाड़ लगा रहे थे।..... दिल्ली में रात में कितने खतरनाक हादसे हो रहे हैं, इसका उदाहरण देते हुए संजीव भी मीना के साथ हो लिए। मीना घर पहुंची तो पूरी सोसाइटी में सन्नाटे बोल रहे थे।इस खामोशी के बीच ही मीना और संजीव कुछ पल तक आंखों से बातें करते रहे। अचानक...मीना ने संजीव का हाथ पकड़कर कहा-अंदर नहीं आओगे क्या?

1 Comments:

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