भाग 11-वादों का बिछौना
संजीव और मीना फ्लैट में दाखिल हो चुके थे। रात के दूसरे पहर की खामोशी बोल रही थी। अपने ड्राइंगरुम की बत्ती ऑन करते हुए सन्नाटे को तोड़ा मीना ने-“ जनाब, कुछ खाएंगे-पीएंगे ? क्या प्रोग्राम है आपका? ”
पार्टी में पी मदिरा का सुरूर अब तक सिर चढ़ चुका था। संजीव ने पहले मीना को एक टूक देखा और फिर अपने जवाब के तौर पर प्रस्ताव रखा डाला- “तुम्हारे होंठों से शराब पीने की चाहत है बंदे की। उसका इंतज़ाम कर दो तो खुदा क़सम आज जन्नत मिल जाए। ”
समझदार को इशारा काफ़ी होता है। मीना तो इस दीन-दुनिया में समझदारी का बहुत ऊँचा पायदान चढ़ चुकी थी। उसने ड्राइंगरुम की बत्तियां बंद कर दीं और खुद बेडरुम में पहुंच गई। बेडरुम में रखे लैंडलाइन फोन पर अमिष के दो मिस्ड कॉल्स की सूचना थी। अमिष ने पार्टी के दौरान मीना के मोबाइल पर भी फोन किए थे, लेकिन शायद उसकी घंटियां उसे सुनायी नहीं दी। अमिष के मिस्ड कॉल के बारे में मीना जब तक कुछ सोच पाती, बाहर संजीव के मोबाइल की घंटी थर्ऱा उठी। रात के दो बजे....कौन हो सकता है....मीना का दिल एक मिनट को दहल उठा।
“नो डार्लिंग...अभी पार्टी में ही हूं। सारा इंतज़ाम देखना पड़ता है। तुम ऐसा करो...आराम से सो जाओ। मैं भी सुबह आ जाता हूं। बाय....एंड टेक केयर ” संजीव ने ये कहकर अपना मोबाइल ऑफ कर दिया।
मीना समझ गई कि रात के दो बजे मिसेज श्रीवास्तव के फोन ने शांति भंग की थी। मीना ने कपड़े बदले और संजीव को आवाज़ दे डाली-“एडिटर साहब..आपको सोना नहीं है क्या?”
बेडरुम की बत्तियां बद थीं। बिस्तर पर मीना और संजीव-दोनों एक दूसरे की आहट महसूस कर रहे थे। शब्द लापता थे और दोनों के बीच मानो मौन पहरा दे रहा था। संजीव की एकबारगी इच्छा हुई कि वो मीना से बत्तिया जलाने को कहे ताकि वो उसके खूबसूरत गदराते जिस्म के दर्शन कर सके। लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हुई। मीना कभी-कभार ही उस पर इस तरह मेहरबान होती थी, लिहाज़ा मौका गंवाना उसे कुबूल नहीं था। संजीव ने अंधेरे में ही मीना के अधरों को चूमते हुए जांघों तक का सफ़र तय कर डाला।
मीना की मखमली जांघों पर हाथ पहुंचते ही संजीव की धड़कने शताब्दी की रफ्तार से दौड़ने लगीं। आंखों की नींद देश छोड़ चुकी थीं और उत्तेजना काबू से बाहर होती जा रही थी। मीना को भी मानो इसी पल का इंतज़ार था। हालांकि, “काम” में संजीव की कामना देख उसे मज़ा आ रहा था लेकिन यही पल शायद उसके काम का भी था। उसने अचानक संजीव को अपनी बांहों में भर लिया और पूछा- “मज़ा आ रहा है जनाब?”
संजीव के पास हां के अलावा कोई जवाब भी नहीं था। वो पूरी तरह उत्तेजित था। लेकिन मीना को मालूम था कि उसे क्या करना है।
“लेकिन साहब,पूरा मज़ा लेने के लिए आपको दो वादे करने होंगे। आप ऑफिस में मेरी सुनते नहीं है। इसलिए अभी कहना ज़रुरी है। पहला वादा ये कि कल आप पेट्रोलियम मिनिस्टरी में बात करेंगे मिस्टर शुक्ला के काम के लिए। उनका पेट्रोल पंप का मामला काफी दिनों से अटका हुआ है। और दूसरा ये कि अब मुझे बीस दिन की छुट्टी चाहिए। कदम का दम मैं निकाल चुकी हूं औऱ मुझे अब कुछ दिन आराम चाहिए। वैसे...भी आज तो मैं और ज़्यादा थकने वाली हूं।” मीना ने अपने शरारती अंदाज़ में संजीव के सामने अपनी बात रख डाली।
संजीव के पास इस बार भी “हां” के अलावा कोई जवाब नहीं था। फोर प्ले ज़ारी था और भोर नज़दीक । अब तक दोनो तरफ़ वासना की आग बेकाबू हो चुकीथी। चादर बिस्तर से गिर चुकी थी और पहरा देता मौन रफ़ूचक्कर हो चुका था। दरअसल, दो जिस्मों के एक होने के दौरान कुछ आवाज़ें ज़रुरी जो होती है................................।

2 Comments:
पुरू जी,
आप का उपन्यास पढ़ रहा हूँ। काफी अच्छा है। क्या आप ने निम्न पृष्ठ देखा है?
ब्लॉग को किताब की शक्ल कैसे दें
उदाहरण के लिए निम्न चिट्ठों को देखें
बुनो कहानी
एचओवी लेन
i am just too excited to find someone whose fav novelo is gunaho ka devta ... i read this 13 years back and bought a copy ...
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