Wednesday, August 31, 2005

भाग 12 : आदि के ख़्वाब

इंडियन टाइम्स के दफ़्तर में पिछले दो दिनों से सिर्फ़ एक ही बात की चर्चा थी। वो थी- डेली न्यू मॉर्निंग नाम के एक अख़बार की। दरअसल, डेली न्यू मॉर्निंग नाम से एक नया अखबार दिल्ली और मुंबई में लांच होने वाला था। एक बड़े उद्योगपति राजाभाई ओबेराय के इस अख़बार के लिए भर्तियों का विज्ञापन दो दिन पहले ही शहर के सभी अख़बारों में प्रकाशित हुआ था। ओबेराय समूह स्टील,पेट्रोल और केमिकल्स के क्षेत्र में देश के अग्रणी व्यवसायी प्रतिष्ठानों में से एक था। हालांकि, मीडिया में इस समूह की दखल न के बराबर थी लेकिन जानकार मानते थे कि मीडिया के क्षेत्र में ओबेराय समूह जल्द ही पैठ बना लेगा।वजह-पैसों का अकूत भंडार और उसे खर्च करने की दिलेरी भी। यदि डेली न्यू मॉर्निंग ने बेहतरीन पत्रकारों को दोगुनी-तिगुनी तनख्वाह पर दूसरे अख़बारों से तोड़ लिया तो कौन माई का लाल क्या कर लेगा ?
मिस्टर बैनर्जी ने भी यही तर्क देते हुए आदित्य के सामने डेली न्यू मॉर्ऩिंग के विज्ञापन वाला अखबार पटका। “बोलो बरखुरदार, अगर दिलचस्पी हो तो बात करूं तुम्हारे लिए इस अख़बार में।”
“लेकिन, दो दिन पहले तो भर्तियों का विज्ञापन आया है। आप किससे बात करेंगे? आदित्य ने मासूमियत से अपना सवाल उछाला। ”
“बेटा, भारतीय मीडिया की अच्छायी कहो या बुराई, लेकिन सच यही है कि यहां भर्तियां बायोडेटा देखकर नहीं की जातीं, कॉन्टेक्ट्स से होती हैं। तुम्हारा पीआर अच्छा है तो नौकरी छोड़ना और पाना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन अगर तुम्हारा पीआर अच्छा नहीं है तो एक नौकरी पानी के लिए खून-पसीना एक हो जाता है। और...तुम्हारी जानकारी के लिए मेरा पीआर अच्छा है।“
आदित्य ने मिस्टर बैनर्जी को अपलक देखा और फिर मन ही मन सोचा कि सिर से यू हीं ये बाल नहीं उड़े हैं अंकल।
मिस्टर बैनर्जी ने विज्ञापन का अख़बार वहीं छोड़ा और आदित्य को नयी जॉब का ऑफर देकर वहां से निकल लिए।
आदित्य को इंडियन टाइम्स में काम करते हुए अभी कुछ महीने ही गुज़रे थे,लिहाज़ा वो इतनी जल्दी नौकरी बदलना नहीं चाहता था।लेकिन मन ही मन उसकी इच्छा पॉलिटीकल बीट पाने की भी थी। इंडियन टाइम्स में मीना ठाकुर जैसी जबरदस्त पत्रकार तो थी ही, पुराना अख़बार होने की वजह से दूसरे कई पत्रकार भी राजनीतिक ख़बरें कवर करते थे। ऐसे में, आदित्य को यहां पॉलिटीकल बीट मिलने में कई साल लग सकते थे। आदित्य के लिए सिर्फ एक यही तर्क मिस्टर बैनर्जी को फोन मिलाने के लिए काफ़ी था।
भारतीय मीडिया में एक बड़ी दिलचस्प बात ये है कि यहां पॉलटिकल बीट को सबसे महत्वपूर्ण समझा जाता है। राजनीति का कखग भी नहीं समझने वाले तथाकथित पत्रकार राजनीतिक ख़बरे ही कवर करना चाहते हैं। भूमंडलीकरण के दौर में आर्थिक पत्रकारिता बहुत अहम हो चली है लेकिन अगर युवा पत्रकारों से पूछो तो पता चलेगा कि सभी राजनीतिक पत्रकारिता में तुर्रम खां होना चाहते हैं। आदित्य भी ऐसा ही तुर्रम खां बनना चाहता था। उसकी भी दिली इच्छा थी कि उसके फोन करने पर बड़े से बड़ा नेता लाइऩ पर आ जाए या उसके कहने भर से कई काम हो जाए। लेकिन, दूसरे तुर्रमों से वो इस मायने में अलग था कि उसे राजनीतिक समझ थी।
“ठीक है बरखुरदार। मैं कल बात करुंगा तुम्हारे लिए। ” आदित्य के फोन का मिस्टर बैनर्जी ने संक्षिप्त में यही जवाब दिया।
आदित्य ने अपना काम खत्म किया और ऑफिस से बाहर निकल लिया। मिस्टर बैनर्जी के अऩुभव में सिर से उड़े हुए बाल औऱ उऩका जबरदस्त आत्वविश्वास देखखर आदित्य को भी भरोसा हो चला था कि मिस्टर बैनर्जी एक बार फिर उसके लिए देवदूत साबित होंगे।

Monday, August 22, 2005

भाग 11-वादों का बिछौना

संजीव और मीना फ्लैट में दाखिल हो चुके थे। रात के दूसरे पहर की खामोशी बोल रही थी। अपने ड्राइंगरुम की बत्ती ऑन करते हुए सन्नाटे को तोड़ा मीना ने-“ जनाब, कुछ खाएंगे-पीएंगे ? क्या प्रोग्राम है आपका? ”
पार्टी में पी मदिरा का सुरूर अब तक सिर चढ़ चुका था। संजीव ने पहले मीना को एक टूक देखा और फिर अपने जवाब के तौर पर प्रस्ताव रखा डाला- “तुम्हारे होंठों से शराब पीने की चाहत है बंदे की। उसका इंतज़ाम कर दो तो खुदा क़सम आज जन्नत मिल जाए। ”
समझदार को इशारा काफ़ी होता है। मीना तो इस दीन-दुनिया में समझदारी का बहुत ऊँचा पायदान चढ़ चुकी थी। उसने ड्राइंगरुम की बत्तियां बंद कर दीं और खुद बेडरुम में पहुंच गई। बेडरुम में रखे लैंडलाइन फोन पर अमिष के दो मिस्ड कॉल्स की सूचना थी। अमिष ने पार्टी के दौरान मीना के मोबाइल पर भी फोन किए थे, लेकिन शायद उसकी घंटियां उसे सुनायी नहीं दी। अमिष के मिस्ड कॉल के बारे में मीना जब तक कुछ सोच पाती, बाहर संजीव के मोबाइल की घंटी थर्ऱा उठी। रात के दो बजे....कौन हो सकता है....मीना का दिल एक मिनट को दहल उठा।
“नो डार्लिंग...अभी पार्टी में ही हूं। सारा इंतज़ाम देखना पड़ता है। तुम ऐसा करो...आराम से सो जाओ। मैं भी सुबह आ जाता हूं। बाय....एंड टेक केयर ” संजीव ने ये कहकर अपना मोबाइल ऑफ कर दिया।
मीना समझ गई कि रात के दो बजे मिसेज श्रीवास्तव के फोन ने शांति भंग की थी। मीना ने कपड़े बदले और संजीव को आवाज़ दे डाली-“एडिटर साहब..आपको सोना नहीं है क्या?”
बेडरुम की बत्तियां बद थीं। बिस्तर पर मीना और संजीव-दोनों एक दूसरे की आहट महसूस कर रहे थे। शब्द लापता थे और दोनों के बीच मानो मौन पहरा दे रहा था। संजीव की एकबारगी इच्छा हुई कि वो मीना से बत्तिया जलाने को कहे ताकि वो उसके खूबसूरत गदराते जिस्म के दर्शन कर सके। लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हुई। मीना कभी-कभार ही उस पर इस तरह मेहरबान होती थी, लिहाज़ा मौका गंवाना उसे कुबूल नहीं था। संजीव ने अंधेरे में ही मीना के अधरों को चूमते हुए जांघों तक का सफ़र तय कर डाला।
मीना की मखमली जांघों पर हाथ पहुंचते ही संजीव की धड़कने शताब्दी की रफ्तार से दौड़ने लगीं। आंखों की नींद देश छोड़ चुकी थीं और उत्तेजना काबू से बाहर होती जा रही थी। मीना को भी मानो इसी पल का इंतज़ार था। हालांकि, “काम” में संजीव की कामना देख उसे मज़ा आ रहा था लेकिन यही पल शायद उसके काम का भी था। उसने अचानक संजीव को अपनी बांहों में भर लिया और पूछा- “मज़ा आ रहा है जनाब?”
संजीव के पास हां के अलावा कोई जवाब भी नहीं था। वो पूरी तरह उत्तेजित था। लेकिन मीना को मालूम था कि उसे क्या करना है।
“लेकिन साहब,पूरा मज़ा लेने के लिए आपको दो वादे करने होंगे। आप ऑफिस में मेरी सुनते नहीं है। इसलिए अभी कहना ज़रुरी है। पहला वादा ये कि कल आप पेट्रोलियम मिनिस्टरी में बात करेंगे मिस्टर शुक्ला के काम के लिए। उनका पेट्रोल पंप का मामला काफी दिनों से अटका हुआ है। और दूसरा ये कि अब मुझे बीस दिन की छुट्टी चाहिए। कदम का दम मैं निकाल चुकी हूं औऱ मुझे अब कुछ दिन आराम चाहिए। वैसे...भी आज तो मैं और ज़्यादा थकने वाली हूं।” मीना ने अपने शरारती अंदाज़ में संजीव के सामने अपनी बात रख डाली।
संजीव के पास इस बार भी “हां” के अलावा कोई जवाब नहीं था। फोर प्ले ज़ारी था और भोर नज़दीक । अब तक दोनो तरफ़ वासना की आग बेकाबू हो चुकीथी। चादर बिस्तर से गिर चुकी थी और पहरा देता मौन रफ़ूचक्कर हो चुका था। दरअसल, दो जिस्मों के एक होने के दौरान कुछ आवाज़ें ज़रुरी जो होती है................................।

Tuesday, August 16, 2005

भाग दस: अंडमान का संग

पोर्ट ब्लेयर के एयरपोर्ट पर उतरते ही अमिष और रश्मि को अहसास हो गया कि ये जगह उससे कहीं खूबसूरत है,जितना की कहा जाता है। छोटा से एयरपोर्ट टर्मिलन पर महज एक और विमान खड़ा था। एयरपोर्ट पर सुरक्षा के ज़्यादा तामझाम नहीं थे। अमिष, रश्मि और उनका कैमरामैन सुनील आधे घंटे के भीतर ही टर्मिनल से बाहर सड़क पर खड़े थे। उनके लिए टैक्सी का इंतज़ाम पहले से किया जा चुका था और वो तीनों टैक्सी में बैठकर पोर्ट ब्लेयर के बीचों बीच बने होटल गैलेक्सी की तरफ़ रवाना हो गए।
होटल में रश्मि के लिए अलग कमरा बुक था। चौथी मंज़िल पर कमरा नंबर 404 । खिड़की से बाहर समुन्दर का हसीं नज़ारा उसे रह रहकर बाहर जाने के लिए प्रेरित कर रहा था। रश्मि समुंदर के दिलकश नज़ारे का लुत्फ ले ही रही थी कि दरवाज़े के बाहर खटखट ने उसका ध्यान भंग कर दिया।
"रश्मि,आई एम अमिष आउटसाइड। डू यू वांट टू कम विद मी? मैं कल की शूटिंग के लिए लोकेशन देखने जा रहा हूं। "
"यस सर। मैं आपके साथ आ रही हूं। आप नीचे चलिए, मैं एक मिनट में तैयार होकर आ रही हूं।" रश्मि ने कमरे के भीतर से ही जवाब दे दिया।
पल भर बाद रश्मि और अमिष होटल के लांज में आमने-सामने खड़े थे। रश्मि की खूबसूरती का अमिष पहले से ही कायल था लेकिन गुलाबी टॉप और दूधिया रैप अराउंड पहने रश्मि खूबसूरती की हर उपमा को बेमानी कर रही थी। अमिष ने धीरे से कहा- "यू आर लुकिंग गार्जियस। बहुत खूबसूरत दिख रही हो तुम।"
रश्मि धीरे से मुस्कुरायी और फिर दोनों नज़दीक के बीच पर चल दिए। रश्मि ने टेलीविजन कार्यक्रमों के लिए एकंरिग कई बार की थी लेकिन एकंरिग के लिए शहर से बाहर अकेले पहली बार आई थी। लिहाज़ा, बार बार संकोच की एक रेखा उसके चेहरे पर झलक पड़ती थी। अमिष यह बात भांप चुका था। उसने अचानक रश्मि का हाथ पकड़ा और बैठा बैठा दिया।
रश्मि पहले तो चौंकी लेकिन फिर संभलती हुए उसने पूछा कि आखिर क्या बात है।
अमिष ने कहा-"देखो,पहला शॉट यही लेंगे। तुम इसी ड्रेस में इसी साहिल पर खुद का परिचय देते हुए कहोगी कि-आईने की तरह साफ ये समुन्दर, नरम ये रेत, दिलकश मौसम और मैं आपकी दोस्त रश्मि पाठक। कुदरत की बनायी इस जन्नत का नाम है-अंडमान।हम अगले तीन एपिसोड तक आपको यहां और आसपास के टूरिस्ट स्पॉट, लोगों की जिंदगी और खान पान से जुड़ी तमाम जानकारियां देंगे। वगैरह वगैरह। "
अमिष ने स्क्रीप्ट की मोटी मोटी चंद लाइनें रश्मि को बताई। रश्मि अमिष के बताने के अंदाज़ और अपने कार्यक्रम को लेकर उसकी उत्सुकता से प्रभावित थी।
अमिष को अंडमान-निकोबार पर तीन एपिसोड़ तैयार करने थे। पहला,अंडमान की खूबसूरती के बारे में, दूसरा निकोबार समेत दूसरे द्वीपों के बारे में और तीसरा अंडमान-निकोबार की जनजातियों के बारे में। अमिष ने अंडमान पहुंचने से पहले वहां के बारे में खासा अध्ययन किया था, लिहाज़ा पूरे इलाके के बारे में उसकी किताबी जानकारी जबरदस्त थी। इस बात का अंदाज रश्मि को हो चुका था।
शाम के सात बज चुके थे। अमिष और रश्मि, दोनों का बदन थककर टूट रहा था। अमिष ने रश्मि से पूछा कि क्या वो थकान उतारने के लिए वाइन वगैरह पीना चाहेगी तो रश्मि का जवाब न में था।
अमिष ने रश्मि को होटल के लांज में छोड़ दिया और खुद बार की तरफ चल दिया।

Wednesday, August 10, 2005

भाग नौ : पार्टी..डांस..मस्ती

ली मेरेडियन का सेंटर हॉल दुल्हन की तरह सजा था। पार्टी की रंगत साफ दिखायी दे रही थी। पार्टी में मौजूद ज़्यादातर लोगों के हाथों में जाम थे। खास बात ये कि शराब का सुरूर लोगों पर चढ़कर बोले,इसके लिए साकी का इंतज़ाम भी किया गया था। डांस फ्लोर पर तिल रखने को जगह नहीं थी।लोग जमकर नाच रहे थे और जो नाच नहीं रहे थे,वो दिल में किसी दिलकश सुंदरी को बांहों में लिए नाचने का ख्वाब देख रहे थे।
कजरारे कजरारे रे...तेरे कारे कारे नैना...........सदा में गूंजते इस तराने पर डांस फ्लोर पर लोगों की मस्ती देखने लायक थी कि अचानक संजीव श्रीवास्तव की मौजूदगी ने फ्लोर पर जगह पैदा कर दी। दरअसल, संजीव मीना का हाथ थामे फ्लोर पर पहुंच चुके थे।मीना खूबसूरत तो थी ही,लेकिन पार्टी के दिन मानो उसकी खूबसूरती को चार चांद लग गए थे।वो साड़ी पहन कर इतनी दिलकश लग रही थी कि वहां मौजूद कई कमसिन हसीनाओं को पसीना छूट रहा था। ऐसे में फ्लोर पर मीना ने जब अपनी बलखाती कमर के झटके दिखाए, तो देखने वाले दंग रह गए। लोगों को इस बात का कतई अंदाज़ नहीं था कि अपनी कलम से बड़े बड़ों के छक्के छुड़ाने वाली इस नाज़नीन को झूमना भी आता है। मीना ने ज़्यादा नहीं पी थी लेकिन डांस फ्लोर पर उसे नाचता देखकर यही लग रहा था कि जैसे उसने आज दिलखोल कर पी है। संजीव भी बस उसे ही देखे जा रहा था।
पार्टी की इसी तड़क भड़क के बीच एक 23-24 साल का नौजवान ऐसा भी था, जो हाथों में कोल्ड ड्रिंक का गिलास पकड़कर किन्हीं ख्यालों में खोया हुआ था। ऐसा मालूम होता था कि स्वर्ग की अप्सराओं की बीच या तो कोई संन्यासी था या नपुंसक। उसकी ख़्यालों के गाड़ी पर अचानक एक वेटर ने ब्रेक लगाया।
“कुछ लेंगे सर?”
“नो थैंक्स ”।24 साल के उस नौजवान ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। इस नौजवान का नाम आदित्य शर्मा था। इंडियन टाइम्स में ज्वाइन किए उसे अभी तीन महीने ही हुए थे। वो रिपोर्टर था और फिलहाल उसे एजुकेशन बीट का जिम्मा दिया गया था।
“क्या बात है आदित्य। किन ख्यालों में खोए हुए हो। मैं बहुत देर से देख रहा हूं, तुमने कुछ लिया भी नहीं।” न्यूज एडिटर दिलीप बैनर्जी ने आदित्य के पास से गुज़रते हुए पूछा।
“नहीं सर,ऐसी कोई बात नहीं है। ”
“देखो बरखुरदार,हम उड़ती चिड़िया के पंख गिन लेते हैं।तुम तो अभी उड़ना भी नहीं सीखे हो।”
दरअसल, दिलीप बैनर्जी ही वो शख्स थे, जिन्होंने आदित्य का सीवी संजीव श्रीवास्तव को दिया था।दिलीप आदित्य के पिता के अच्छे दोस्तों में थे और आदित्य के पिता के निधन के बाद से उसके परिवार का हाल चाल लेते रहते थे।
“सर, एक उलझऩ थी। उसी से जूझ रहा था। लेकिन,ये वक्त उस पर बात करने का नहीं है।मैं आपसे कल बात करुंगा।आज आप पार्टी इन्जॉय कीजिए” आदित्य ने दिलीप बैनर्जी के सभी सवालों को यही जवाब दिया।
उधर,डांस फ्लोर पर तापमान लगातार बढ़ रहा था। मीना की ज़ुल्फें खुलकर बिखर चुकी थीं और पसीने से तर-बतर संजीव का कोट हवा में लहराने के बाद एक जूनियर सब एडिटर के कंधों की शोभा बढ़ा रहा था।
मस्ती का समां रुका तो घड़ी रात के ढ़ाई बजा चुकी थी। कुछ खबरनवीस टल्ली होकर सोफे-कुर्सी पर जम गए थे,तो कुछ किसी का दामन पकड़े घर जाने की जुगाड़ लगा रहे थे।..... दिल्ली में रात में कितने खतरनाक हादसे हो रहे हैं, इसका उदाहरण देते हुए संजीव भी मीना के साथ हो लिए। मीना घर पहुंची तो पूरी सोसाइटी में सन्नाटे बोल रहे थे।इस खामोशी के बीच ही मीना और संजीव कुछ पल तक आंखों से बातें करते रहे। अचानक...मीना ने संजीव का हाथ पकड़कर कहा-अंदर नहीं आओगे क्या?

Sunday, August 07, 2005

भाग आठ : ;चैनल टू की रश्मि

दोपहर के दो बज रहे थे। दिन के दूसरे पहर तक चैनल टू के ऑफ़िस में सरगर्मियां नदारद थी। जो रिपोर्टर दफ़्तर में थे, वो गप्प लड़ा रहे थे,जबकि डेस्क वाले किसी बड़ी ख़बर के न आने की दुआ मांगते हुए घर जाने का इंतज़ार कर रहे थे। हालांकि,समाचारों की इस हलचली दुनिया के सन्नाटे में अमिष का काम जारी थी।उसे अगले महीने की शुरुआत से ही एक खास ट्रैवल शो शुरु करने का जिम्मा सौंपा गया था। शुरुआत कश्मीर की हसीं वादियों से होनी थी, जिसे लद्दाख होते हुए अंडमान में समुन्दर में समाना था। तीस एपिसोड के इस शो की रुपरेखा तैयार करने से लेकर उसकी स्क्रिप्ट लिखने,एंकर तय करने और फिर सही वक्त पर प्रोमो चलवाने तक का जिम्मा अमिष का ही था। अमिष को इतनी बड़ी जिम्मेदारी पहली बार सौंपी गई थी,लिहाज़ा उसका चिंतित होना लाज़िमी था।
अमिष ने लोकेशन के बारे में सोच रखा था। स्क्रिप्ट का भी मोटा मोटा अंदाज़ उसे था। लेकिन,वो एंकर के बारे में तय नहीं कर पा रहा था।उसे एक ऐसी एंकर की तलाश थी,जो कश्मीर की कुर्ती से लेकर चेन्नई की साड़ी तक में न सिर्फ़ खूबसूरत लगे बल्कि सेक्सी भी लगे। वो चेहरा ऐसी कशिश पैदा करे कि दर्शक की निगाह एक पल के लिए ठहर जाए। दरअसल, अमिष की स्पष्ट धारणा थी कि टेलीविज़न आकर्षक चेहरे-मोहरे वालों का माध्यम है।दर्शक पहले खूबसूरत-आकर्षक चेहरे को देखकर रुकता है और फिर कंटेंट में दम हो तो ठहरता है।लेकिन...चैनल टू में क्या कोई ऐसा चेहरा है ?
अमिष ऐसे चेहरे की तलाश को लेकर अपने मन के घोड़े दौड़ा ही रहा था कि उसे पीछे से एक आवाज़ सुनाई दी।
"हैलो सर, आई एम रश्मि....। रश्मि पाठक । मैं मिस्टर अमित कुमार के रिफ़रेंस से आपके पास आई हूं।उन्होंने मुझे बताया था कि आपको एक एंकर की तलाश है।"
अमिष ने रश्मि का धीरे से अभिवादन किया लेकिन उसी एक पल में उसने इस नाज़नीन को निहार लिया। खूबसूरत,शोख,हसीं,दिलकश जैसी तमाम उपमाएं अचानक उसके जुबां पर आकर ठहर गईं।अमिष ने रश्मि को बैठने का इशारा करते हुए कहा- "अपना बायो डेटा लाई हैं आप? "
रश्मि ने मुस्कुराते हुए अपना बायो डेटा अमिष की तरफ बढ़ा दिया। हालांकि,रश्मि के CV में वो सब था, जिससे उसे एंकर की जॉब मिल सकती लेकिन हकीकत यह थी कि अमिष ने उसे देखते ही तय कर लिया था कि वो ही उसके शो की एंकर होगी।
रश्मि का औपचारिक सा साक्षात्कार लेने के बाद अमिष ने उससे जाने को कह दिया।

Saturday, August 06, 2005

A REQUEST

Dear Readers,
It feels great when someone notice your creative work. Though, this is totally popular writing but I think that readers have liked it. When I had started this blog “Pages123- An Inside Story Of Media”, I was not sure about readers response. Today, I am happy that Hindi readers are reading my blog and reacting on it. But It is not enough. I have a data about readers number but didn’t get that much comment. I want to say all of my readers that please comment on blog. Though, this is transcription of a screenplay but we had written screenply for only 7-8 episode. Yes, the story of Inside story of Media was in our mind. So, Please tell me your view, so that I could decide about this blog’s future.
ThanksPuru

Tuesday, August 02, 2005

भाग सात : लेट्स इन्जॉय

आज ऑफ़िस में अजीब सा सन्नाटा पसरा था। ऑफ़िस ब्यॉय सभी वक्त पर अपनी यूनिफ़ॉर्म में मौजूद थे और सभी निर्देशों का तत्काल पालन किया जा रहा था। कंप्यूटर की बोर्ड से उंगलियों के मिलाप की आवाज़ भी रह रह कर गूंज रही थी।घड़ी अपनी रफ़्तार से दौड़ रही थी लेकिन संपादक संजीव श्रीवास्तव के केबिन के बाहर बैठे सभी रिपोर्टर,सब एडिटर और दूसरे कर्मचारी सांस रोके केबिन की तरफ नज़र गढ़ाए बैठे थे। दरअसल,इंडियन टाइम्स के मालिक प्रह्लाद कुमार आज काफ़ी दिनों बाद ऑफ़िस पहुंचे थे। उन्होंने आते ही संजीव श्रीवास्तव और मीना ठाकुर को बुला भेजा। उनके चेहरे के भाव साफ़ कह रहे थे कि मामला कुछ गड़बड़ है।
"आप लोग अब इतने बड़े पत्रकार हो गए हैं कि एक मिनिस्टर को ऐसी तैसी करने से पहले आप मुझे बताना तक ज़रुरी नहीं समझते? आज आपने कदम का दम निकाला है, कल आप किसी और की ले लेंगे। कुछ चंडूखाने की ख़बर भी आप छाप सकते हैं।"
"सर,पूरी तहकीकात के बाद ही हमने कदम के बारे में रिपोर्ट छापी है।मीना ने पूरे दो हफ़्ते तक इस रिपोर्ट पर काम किया है।घोटाले से जुड़े सारे दस्तावेजों की फोटो कॉपी हमारे पास है।"
"लेकिन,मैं पूछ रहा हूं कि एक मिनिस्टर की झंड करने से पहले क्या आप अख़बार के मालिक को बताना तक ज़रुरी नहीं समझते? मेरे पास कल रात में होम मिनिस्टर का फ़ोन आया था। पूछ रहे कि थे क्या पूरे सबूतों के साथ ख़बर छापी गई है या.....। अब अपन को कुछ पता हो तो उन्हें बताऊं"
"सॉरी सर। " संजीव श्रीवास्तव के पास प्रह्लाद कुमार के विष बुझे सवालों की बस एक यही ढाल थी।
"सॉरी...सर..वी विल टेक केयर इन फ़्यूचर " मीना ने भी धीरे से खेद प्रकट कर डाला।
सॉरी की लोरी सुनकर प्रह्लाद कुमार का क्रोध कुछ शांत हुआ। मीना की क़ातिल मुस्कुराहट में उनके गुस्से पर और पानी डाला।संजीव ने भी हालात को समझते हुए फौरन तीन कॉफी का ऑर्डर दे दिया।
"लाइए...सारे दस्तावेज दिखाइए। किस आधार पर आप लोगों ने कदम और उसके पीए की कहानी झंड की है।"
संजीव ने अपने लॉकर से सारे दस्तावेज प्रह्लाद कुमार के सामने रख दिए।मीना ने भी उनमें से खास कागजों को ऊपर रख दिया। प्रह्लाद कुमार ने उनपर गंभीरता से नज़र मारी और फिर सारे डॉक्यूमेंट समेट कर संजीव के हाथ में धर दिए।
"वेल डन। गुड वर्क। मज़ा आ गया। "
"यू पीपल हैव डन फेन्टास्टिक जॉब। इस बात पर एक पार्टी होनी चाहिए। अगले संडे को एक पार्टी का ऐलान कर दो। ली मेरेडियन में। हां..लेकिन अब आगे से ध्यान रखना कि ऐसी कोई भी इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट कवर करने से पहले मुझसे पूछ लिया करो।"
प्रह्लाद ने संजीव की तरफ़ मुस्कुरा कर देखा और केबिन से बाहर निकल लिए। संजीव ने शरारती अंदाज़ से मीना को निहारा और उसे इशारा करते हुए प्रह्लाद कुमार के पीछे भागा।....बॉस आई एम कमिंग.......................