Saturday, July 02, 2005

भाग तीन : दिल्ली फ़िल्म पत्रकारिता का राजा

दिल्ली में रविवार का दिन कितना सुकून भरा होता है, ये बात वहां के पत्रकार खूब जानते हैं। इसलिए नहीं कि रविवार छुट्टी का दिन है या सरकारी विभागों से ख़बरें नहीं निकलतीं बल्कि इसलिए क्योंकि रविवार को ट्रैफिक नहीं होता। दरअसल,छुट्टी का दिन होने की वज़ह से सुबह के वक्त दफ़्तर और शाम को वक्त से घर पहुंचा जा सकता है। वरना,दूसरे दिनों में तो सड़क पर ट्रैफिक का हाल कुछ ऐसा होता मानो महाभारत के युद्ध के दौरान कुरुक्षेत्र में कोई कुत्ता फंस गया हो। इधर से तीर,उधर से भाला....जाए तो जाए कहां साला। आम दिनों में महाभारत युद्ध सरीखे ट्रैफिक के बीच अपनी गाड़ी चलाने में आराम नहीं मिलता बल्कि हराम हो जाता है। लेकिन, संडे को छुट्टे निकल लो किसी भी दिशा में.....।
"इंडियन टाइम्स" के दफ़्तर से शाम को निकलते वक्त खाली सड़क को देखकर कुल्लू ने चैन की सांस ली। कुल्लू यानि कुलदीप कुमार। इंडियन टाइम्स के दिल्ली के दफ़्तर से फ़िल्म से जुड़ी जितनी भी खबरें निकलती थी, कुल्लू की कलम की ही देन होती थीं। पिछले ही दिनों उसने शिल्पा शेट्टी की शादी की ख़बर ब्रेक की थी...वो भी दिल्ली में बैठे बैठे।
कुल्लू ने खाली चमकती सड़क को मल्लिका के उरोजों सा निहारा और अपनी सेट्रों दौड़ा दी ली मेरेडियन की तरफ। आज मल्लिका से उसका एक्सक्लूसिव इंडरव्यू तय जो था। कुल्लू के लिए ये कोई नयी बात नहीं थी लेकिन उसने मन ही मन सोच रखा था कि मल्लिका की ऐसी टांग खीचेंगा कि वो ज़िन्दगी भर किसी को एक्सक्लूसिव इंटरव्यू नहीं देगी। मज़े की बात ये कि कुल्लू की ये खीज़ मल्लिका के किसी सीन की वज़ह से नहीं थी बल्कि इसलिए थी क्योंकि एक साल पहले मल्लिका ने उसे इंटरव्यू देने से इंकार कर दिया था। उस वक्त कुल्लू "मरघट की भूमि" नाम के एक क्राइम वीकली में था। कुल्लू ने जैसे ही अपने अखबार का नाम बताया था, मल्लिका एक ज़रुरी काम का बहाना बताकर बाहर निकल गई थी।
....हुंह। कुल्लू ने लंबी आंह भरी और ली मेरिडिन के लांज में दाखिल हो गया। "वेयर इज़ मल्लिका स्टेयिंग" कुल्लू ने रिसेप्शन पर पूछा और जवाब पाकर रुम नंबर 333 की तरफ बढ़ गया। दरवाजा खटखटाते ही....मल्लिका के पीए ने दरवाजा खोला।
" हाई..आई एम कुलदीप कुमार फ्रॉम इंडियन टाइम्स"। कुलदीप ने अपना परिचय दिया।
"यस यस..कम कम..।मैडम इज़ इगरली वेटिंग फॉर यू।" पीए ने ये कहते हुए कुलदीप को सूट के बाहर के कमरे में बैठने का इशारा कर दिया।

4 Comments:

At 5:00 PM, July 04, 2005, Blogger vichlit said...

I read first time and I m so impressed.Its nice effort but i think u should write more frequently.

 
At 2:12 AM, August 08, 2005, Anonymous Anonymous said...

मज़ेदार है जनाब लिखते रहिए...उपन्यास-सा मज़ा है...शुक्रिया.

 
At 1:07 AM, March 07, 2006, Anonymous Anonymous said...

बहुत आच्छा इसी तरह से लिखते जाईए। ताकी हम आपसे प्रेरणा लेते रहे। लेकिन साथ ही मल्लिका क आलावा भी दुनिया में बहुत कुछ है उन के 333 न. रूम से बाहर निकलिए और जनाव किसी और भी पर्दा उठाईए। अमित कुमार शर्मी , दिल्ली

 
At 2:14 AM, March 24, 2007, Anonymous sana said...

It was a pleasent surpruse to see a hindi novel online.but i am not able to corelate one part with another.is it anovel or daily diary. but whatever it is a good effort.

 

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