Thursday, June 23, 2005

भाग दो : यादों के झरोंके से

मीना आज अरसे बाद ऐसे वक़्त घर पहुंची, जब सूरज की खूबसूरत किरणे अपनी पूरी सुंदरता के साथ घर की खिड़कियों से झांक रही थीं। मीना ने सोफ़े पर बैग पटका और बालकनी का दरवाज़ा खोल दिया। उसने पहले कुछ पल तो सूरज की आंखों में झांका और फ़िर मन ही मन कहा- "देखों, मैं तुम्हें भूली नहीं हूं।" दरअसल, मीना भोर के इस नज़ारे को देखकर कुछ देर तक पुरानी यादों में खो गई थी। कॉलेज के दिनों में कैसे मां सुबह सुबह पढ़ने के लिए जगा दिया करती थी और कैसे पापा ने सुबह की चाय के समय अख़बार पढ़ने की आदत डलवाई, मीना के सामने ऐसी कई यादें फ्लैशबैक की तरह घूम गई। उसने अपने लिए चाय बनाई और अख़बार की सुर्खियों पर नज़र डाली और फ़िर एक बार सूरज की आंख में आंख डालने की हिमाकत कर डाली।ले किन,तब तक सूरज की तपिश चेहरे को जलाने लगी थीं।मीना अपने इस खेल पर एक पल को मुस्कुरायी। फिर अचानक उसे अपनी वो कविता याद आ गई, जो उसने पापा के चौथे मंज़िल के घर की छत पर एक दिन सूरज को देखकर ही लिखी थी।उसने कोशिश की कि शायद उस कविता की दो चार लाइन याद आ जाएं।
"अपनी चौथी मंज़िल के घर पर
मैं जब सूरज की किरणों का साक्षात्कार करती हूं
मद्धम-शीतल हवा का स्पर्श करती हूं
तो पाती हूं
कि इस महानगरीय जीवन में अभी भी कुछ क्षण आरामदायक हैं..
किन्तु
क्या ये पल मुझे सदैव सुखद अनुभूतियां देते रहेंगे
या
कुछ वर्षों बाद
मुझे ऐसे पलों को खोजने के लिए
किसी बीसवीं मंज़िल का घर खोजना होगा।"
हां..शायद कुछ ऐसी ही थी कविता....मीना मन ही मन बुदबुदायी। दरअसल,आठ-दस साल में मीना की ज़िंदगी बहुत बदल चुकी थी। कॉलेज की छात्रा से वो मशहूर ज़र्नलिस्ट का सफ़र तय कर चुकी थी। शर्माने-सुकचाने वाली मीना अपने परिचितों के बीच बोल्ड माने जाने लगी थी। मां-बाप का घर छूट चुका था और वो चौथे मंज़िल के घर से 12वीं मंजिल के घर पहुंच चुकी थी। वो भी दुखद यादों के साथ। मीना ने अमिष के साथ प्रेम विवाह किया था। लेकिन...मीना के मां-बाप को सिर्फ इसी बात पर एतराज़ नहीं था। अमिष दूसरी जाति का तो था ही, साथ ही मीना से उम्र में भी ढ़ाई साल छोटा था। इसके अलावा,शादी के वक्त उसकी नौकरी भी कोई खास बढ़िया नहीं थी।मीना और अमिष ने जिस वक्त शादी का फ़ैसला किया, दोनों की तनख्वाह़ में करीब आधे का अंतर था।
इन यादों ने सुबह सुबह ही मीना की आंखों नम कर दी। वो शायद रो भी देती लेकिन तभी मोबाइल फोन की घंटी बज उठी। मीना ने फोन उठाया तो आवाज़ आयी- " हाय डार्लिंग....आई एम कमिंग।"

Thursday, June 16, 2005

भाग-1 (मीना ठाकुर : नामचीन नाज़नीन)

सूरज की तपिश बाहर भले ही अंगारे बरसा रही थी लेकिन “इंडियन टाइम्स ” के दफ़्तर के भीतर अचानक मौसम बेहद खुशगवार हो उठा था। कई चेहरों पर मुस्कान खिल उठी और कई नज़रों में लौ जल पड़ी।... और फ़िज़ा महक उठी एक शानदार खुशबू से।बदली रंगत को देखकर “समझदार” लोग समझ गए कि मीना ठाकुर ऑफिस पहुंच चुकी हैं।
मीना ठाकुर पेशे से तो पत्रकार थी लेकिन उसमें अदाएं ऐसी कि फिल्मी हीरोइनें भी मात खा जाएँ। दरअसल, मीना में ये अदाएं यूं हीं नहीं थीं। उसकी पेड़ सी लंबाई, जिसके तने से लिपटी काली ज़ुल्फ़ें.....रंग सांवला लेकिन उनमें भी अजीब सी कशिश...। किसी शायर के लिए वो पूरी एक नज़्म सी और दफ़्तर के लोगों के लिए- जबरदस्त सेक्सी।
“गुड मॉर्ऩिंग पाटील, हाऊ आर यू डुइंग। क्या ख़बर है आज ? ”
“कुछ खास नहीं” पाटील ने लगभग सकपकाते हुए जवाब दिया।दरअसल,पाटील को कतई अंदाज़ नहीं था कि उसके ख़्वाबों की हसीना अचानक कोने में बैठे उस अंजान से शख्स से इस तरह कोई सवाल करेगी।
मीना ठाकुर ने पाटील से सवाल किया और सीधे पास बने एडिटर के केबिन में घुस गई।
“यस बॉस- कोई खास असाइनमेंट मुझ नाचीज़ के लिए” मीना ने आँखों में शरारत और होठों पर मादकता लिए अपने दिलकश अंदाज़ में एडिटर संजीव श्रीवास्तव से पूछा।
“नो डियर । खास असाइनमेंट होता है तो बंदा खुद तुम्हारे दरवाजे पहुंच जाता है।” संजीव ने भी उसी शरारत से जवाब दिया।
“बट सिट डाउन। आई हैव एन इंटरेस्टिंग असाइनमेंट फॉर यू।मुझे पता लगा है कि फॉरेस्ट मिनिस्टर पी.के.कदम का अपने पी.ए की बीबी से चक्कर चल रहा है।लेकिन..दिलचस्प बात ये है कि कदम के पी.ए शेखर मोहंती को न केवल इस गड़बड़झाले की खबर है बल्कि वो जानबूझकर अपनी बीबी को मंत्री के आगे परोस रहा है।वो भी अपने किसी फायदे के लिए नहीं बल्कि किसी और के कहने पर।मैं चाहता हूं तुम पता लगाओ....क्या मामला है। बड़ा स्कूप बन सकता है यह।”
“यस बॉस-आई विल ट्राई”। ये कहते हुए मीना केबिन से बाहर निकल गई।