Sunday, May 22, 2005

Inside Story of Media

हिन्‍दी ब्‍लॉग के सुधी पाठकों को पुरू का नमस्‍कार। मित्रों, हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में प्रवेश का मुझे काफी वक्‍त से इंतज़ार था। लेकिन यह तय नहीं कर पा रहा था कि किस विषय को लेकर आप लोगों के बीच आऊँ। भला हो प्रसार भारती का (बुरा हो) जिसने हमारे धारावाहिक का पायलट एपीसोड देखने के बाद उसे पास करने से इन्‍कार कर दिया। अधिकारियों के मुताबिक धारावाहिक का बोल्‍ड विषय दूरदर्शन के भोले दर्शक पचा नहीं सकते थे, लेकिन मण्‍डी हाउस के दलालों की मानें तो अधिकारियों की जेब गर्म कर पाने की क्षमता हमारे हरे नोटों में नहीं थी। बहरहाल, एपीसोड खारिज हो गया और हमारी जुगाड़ें धरी की धरी रह गयीं। ऐसे में ये पूरा धारावाहिक अब मैं आपके सामने उपन्‍यास की शक्‍ल में रफ़्ता-रफ़्ता पेश करूंगा। स्‍क्रीन-प्‍ले को उपन्‍यास की शक्‍ल देने में कुछ वक्‍त लगेगा, लिहाज़ा धीरे-धीरे हर कड़ी ब्‍लॉग पर दिखाई देगी। इस उपन्‍यास का नाम है 'पेजेज़-123'। द़रअसल यह कहानी है पत्रकारिता संसार में फैले भ्रष्‍टाचार की; ऊँचे लोगों के और ऊँचा उठने की चाहत में नीचे गिरने की; मेनकाओं, उर्वशियों और रम्‍भाओं के नगरवधु बनने की; नौजवानों के लड़खड़ाते कदमों की और बड़े-बड़े क्रान्‍तिकारी ख़्वाबों के पल भर में बिखरने की। लेकिन इस आधुनिक युग की महाभारत में कुछ पाण्‍डव शिद्दत से अपनी मर्यादाओं और विचारों को बचाने के लिए दिन-रात एक भी किए हुए हैं। इसी पूरे ताने-बाने के साथ यह उपन्‍यास पेश-ए-खिदमत है।