Tuesday, December 20, 2005

भाग 19 : ये कैसी मुहब्बत

पत्रकारों के लिए रविवार का कोई खास मतलब नहीं होता। आमतौर पर उनकी छुट्टी नहीं होती (बॉसेज़ के अलावा) लेकिन रविवार को काम करने का एक फायदा यह ज़रुर होता है कि उस दिन अमूमन काम ठंडा रहता है। आदित्य के पास भी रविवार को दफ़्तर में ज्यादा काम नहीं रहता था। फोन पर गपियाना और एक दो छोटी मोटी ख़बरे दे देने भर से काम चल जाता था। उस दिन भी उसे ऐसी ही उम्मीद थी लेकिन दफ़्तर पहुंचते ही उसके आराम का कार्यक्रम भंड हो गया। न्यू डेली मॉर्निंग से अचानक इंटरव्यू के लिए फोन जो आ चुका था। वैसे तो आदित्य को इंटरव्यू देने में कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन उसे पॉलिटिकल बीट चाहिए थी,लिहाजा वो थोड़ी तैयारी करना चाहता था।
"सर, आज मेरा ऑफ नहीं है और ऑफिस में मेरे पास बहुत काम है। मेरे कुछ साथी भी छुट्टी पर हैं। अगर आप इंटरव्यू कल अरेंज करा दें तो बहुत मेहरबानी होगी।" आदित्य ने न्यू डेली मॉर्निंग के दफ़्तर में फोन कर संबंधित शख्स से गुजारिश की।
आदित्य को जैसी उम्मीद थी, वैसा ही हुआ। उसका इंटरव्यू सोमवार को रखवा दिया गया। आदित्य ने फौरन दफ़्तर में बहाना बनाकर छुट्टी ली और वहां से घर की तरफ रवाना हो लिया।
लेकिन,आदित्य को नहीं मालूम था कि पत्रकारिता की दुनिया उससे भी छोटी है,जितनी वो सोचता है। आदित्य ने दफ़्तर से बाहर कदम रखा ही था कि उसके मोबाइल की घंटी घनघना उठी। मीना ठाकुर का फोन था। मीना आमतौर पर आदित्य को फोन नहीं करती थी। ज़रुरत के वक्त आदित्य ही मीना को फोन किया करता था लेकिन आज अचानक ?
आदित्य को समझ नहीं आया। "जी मैडम, कैसे याद किया आपने। "
क्या आदित्य,कहां हो तुम। फौरन मेरे घर आ जाओ। मीना से लगभग आदेश कर डाला।
मरता क्या न करता। नई नौकरी का इंटरव्यू भर था,कोई ऑफर लैटर लेने नहीं जाना था,जो आदित्य मीना सरीखी कद्दावर सीनियर को इंकार कर देता। उसकी नयी नौकरी अभी पक्की नहीं थी,सो वो मीना ठाकुर के घर की तरफ चल पड़ा।
"कितने मिल रहे हैं तुम्हें वहां " मीना ने आदित्य को बैठाने के बाद सीधे सीधे सवाल कर डाला।
आदित्य हतप्रभ। ठगा सा। अभी तो इंटरव्यू हुआ भी नहीं है कि मीना के पास खबर पहुंच गई, कैसे?
"मैडम, अभी तो इंटरव्यू भी नहीं हुआ है। और फिर, मेरा वहां इंटरेस्ट पैसे की वजह से नहीं है।" आदित्य ने सधे शब्दों में जबाव भी दे दिया।
"मैं जानती हूं तो वहां पॉलिटीकल बीट चाहते हो।लेकिन,बरखुरदार राजनीति इतनी आसान नहीं है। लेकिन,सोचो वो नया अखबार है।पहली बात तो यह कि तुम खबर निकाल नहीं पाओगे और निकाल भी लीं तो उन्हें पढ़ेगा कौन। यहां एजुकेशन बीट पर तुम्हारी खबरें खूब पढ़ी जाती है।"
"मैम, मैं दावे तो नहीं करना चाहता लेकिन अगर मौका मिलेगा तो खबरों की कमी नहीं होने दूंगा। और आगे बढ़ने के लिए रिस्क तो लेना ही पड़ता है।"
मीना को भी अब सवाल-जबाव में मज़ा आने लगा था। " तो तुम पॉलिटीकल रिपोर्टर बन कर रहोगे? "
"मैम,मुझे लगता है,मेरी राजनीतिक समझ ठीक ठाक है और मुझे मौका चाहिए।"आदित्य ने फिर सधा हुआ जवाब दिया।
हालांकि, मीना ने संजीव के कहने पर आदित्य को रोकने की कोशिश करने बुलाया था। दरअसल, वो आदित्य को जताना चाहती थी कि उसे राजनीतिक समझ बिलकुल नहीं है,सो उसे चुपचाप एजुकेशन बीट ही देखनी चाहिए।लेकिन,आदित्य के जोश को देखकर उसे अच्छा लगा।उसे शुरुआती दौर की अपनी पत्रकारिता भी याद हो आई।
मीना ने आदित्य के उजले चेहरे को एक पल के लिए निहारा। उसे आत्मविश्वास से लबरेज चेहरा अच्छा लगा।
"आदित्य, मैं तुमसे वादा तो नहीं करती लेकिन अगर मैं तुम्हें अपने अखबार में ही पॉलिटिकल रिपोर्टिंग दिला दूं तो क्या तुम अपना फैसला बदल दोगे। "
"मैम, नेकी और पूछ पूछ। मैं आपका गुलाम हो जाऊंगा। "
"चलो ठीक है। तुम इंटरव्यू छोड़ो। मैं तुम्हारा काम करवा दूंगी । इस बीच, तुम अपनी राजनीतिक समझ और विकसित करो।" मीना ने फिर आदेशात्मक लहजे में सलाह दी।
आदित्य ने राय ली, हां मे सिर हिलाया और मीना के घर से निकल पड़ा। एक पल के लिए उसे लगा कि मीना ने उसकी दिल की बात सुन ली। फिर एक पल के उसे लगा कि कहीं मीना उससे मुहब्बत तो नहीं करने लगी। फिर...एक पल के उसे लगा कि कहीं वो मीना को चाहने तो नहीं लगा है........?????

Monday, October 17, 2005

भाग 18 :शक की चिंगारी

पिछले कई दिनों के बाद अमिष ठीक वक्त पर घर लौटा था। मीना की छुट्टियां शुरु हो चुकी थी और आज उसका पहला दिन था। मीना की बहुत इच्छा थी कि वो अमिष के साथ कुछ वक्त साथ गुज़ारे। इसके लिए उसने मनाली जाने का कार्यक्रम बना रखा था। हालांकि,प्रोग्राम पर अमिष की मुहर लगनी बाकी थी लेकिन मीना को मालूम था कि अमिष उसके इस कार्यक्रम को भंड नहीं करेगा।
"ओ डार्लिंग, टुडे यू हैव कम वेरी अरली। तुम्हें शायद याद था कि आज से मेरी छुट्टियां शुरु हो रही हैं।"
मीना ने दरवाजे पर अमिष को खड़ा देखकर सबसे पहले यही प्रतिक्रिया दी। लेकिन अमिष के चेहरे पर पर हमेशा की तरह चमकने वाली क्लोजअप मुस्कान न देखकर मीना ने अपनी बात थोड़ी बदल दी।
"क्या हुआ डार्लिंग। व्हाट हैपन। तुम कुछ उदास दिख रहे हो। "
"नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। कुछ थक गया हूं।" अमिष ने हड़बड़ाते हुए जवाब दिया।
अमिष ने मीना को चाय बनाने को कहा और सोफे पर बैग पटक कर बाथरुम की तरफ चल दिया। अमिष के इस व्यवहार ने मीना को यकीं दिला दिया कि कुछ गड़बड़ तो ज़रुर है।
"चलो, जनाब का मूड सही कर देते हैं।" मीना ने चाय का प्रोग्राम छोड़ कर फ्रीज में रखी बीयर निकाल दी। कमरे की बत्तिया बुझा दी और कैंडेल लाइट का इंतजाम कर दिया गया। कुछ ही पल में कमरे में रोमानी संगीत भी मद्धम मद्धम गूंजने लगा।
अमिष ने बाथरुम से बाहर बैडरुम में कदम रखा तो बदले माहौल को देखकर चौंक गया। लेकिन, एक ही पल में उसे मीना के इरादों का पता चल गया। मीना अमिष के गलों में अपनी बांहों का हार पहना चुकी थी। इससे पहले अमिष कुछ पहल करता, मीना ने अमिष के गीले होंठों पर अपने गर्म होंठ रख दिए।
मीना के लबों को चूमते ही अमिष भी अपनी उदासी कहीं कूढ़े के ढेर में फेंक कर उत्तेजित हो उठा। हालांकि, मुहब्बत का खेल शुरु हो चुका था लेकिन अचानक न जाने उसे क्या सूझा कि उसने मीना को एक झटके में अलग कर बिस्तर पर बैठा दिया।
मीना को समझ नहीं आया कि अचानक अमिष को क्या हो गया। इससे पहले वो कुछ समझ पाती, अमिष की चंद पंक्तियां उसे यादों के आगोश में ले जाने लगीं।
अमिष ने गुनगुनाना शुरु कर दिय था-
एक ख्वाब
सांझ से भोर तले
मेरी पलकों को घेरे रहता है
कि
तुम हो शांत निश्चल
आगोश में मेरी
और
मैं आनंदित निर्लिप्त हूं तुझमें
मौन दे रहा है पहरा
और शब्द छटपटा रहे हैं
मिलन की परिधि में आऩे को
पर हमारे मिलन की सीमा के भीतर
शब्दों के लिए जैसे कोई स्थान ही नहीं
जब कभी
मेरी धड़कनों को सुनकर
तुम अपनी बिखरी हुई जुल्फों को बनाने
मेरे कंधे से सिर उठाकर
मेरे चेहरे के सामने
अपना चेहरा लाती हो,तब
शब्द चंचल होकर
अपना स्थान खोजने लगते हैं
लेकिन तब
मेरे अधर तुम्हारे अधरों से
बातें करने लगते हैं
मौन तब भी देता है पहरा
और
शब्द तब भी अपना अस्तित्व खोज रहे होते हैं।
"कहो कैसी लगी" अमिष ने शरारत भरे अंदाज में मीना से पूछा।
"तुम्हें अभी तक याद है ये कविता। चार साल हो गए। तुमने बार किस किया था मुझे और उसके बाद अगले दिन ऑफिस में मेरे हाथों में ये कविता थमा दी थी। मैंने संभाल कर रखी है। " कविता सुनकर मीना तो एक पल के लिए भावुक हो गई। वासना का ज्वार अचानक ठंडा पड़ रहा था और निश्चल प्रेम की चिंगारी फिर फूटने लगी थी। अमिष ने भी मीना की नम होती आंखों को देखकर उसे बांहों में भर लिया। कई दिनों बाद दोनो के बीच प्यार तो था, लेकिन एक दूसरे को पाने की हवस कहीं नहीं थी।
इस खामोशी को अमिष ने तोड़ा- "क्या मैडम, आज खाना खिलाने का प्रोग्राम नहीं है क्या"
मीना ने धीरे से अपनी नम आँखों को पोंछा और मुस्कुराते हुए बोली-"क्यों नहीं। आज तो खास प्रोग्राम है।"
मुहब्बत भरे इस माहौल में अचानक बजी घर की डोर बेल दोनों को कर्कश सी जान पड़ी।
"रात के दस बज रहे हैं, कौन आ सकता है इस वक्त"। मीना ने अमिष से सवाल किया।
अमिष ने दरवाजा खोला तो दंग रह गया। सामने रश्मि खड़ी थी। रश्मि पाठक। अमिष को क्षण भर के लिए समझ नहीं आया कि वो उसे देखकर मुस्कुराए या दरवाजा बंद कर ले।
अमिष इससे पहले कुछ कहता- मीना दरवाजे पर पहुंच चुकी थी। मीना ने आँखों ही आंखों में रश्मि का अभिवादन किया लेकिन रात के दस बजे पहली बार इस नये चेहरे को देखकर मीना हैरान थी।
"हाय अमिष, दरअसल, मैं यहां से गुज़र रही थी तो सोचा कि कल के स्पेशल प्रोग्राम के बारे में तुमसे डिस्कस कर लूं। आज ज्यादा वक्त नहीं मिल पाया था।" रश्मि ने दरवाजे के बाहर खड़े खड़े ही धीरे से अपनी बात रखी।
लेकिन, अमिष के चेहरे का उड़ा रंग देखकर मीना भांप चुकी थी कि रश्मि के घर आने का मकसद सिर्फ कार्यक्रम के बारे में चर्चा करना भर नहीं था। इसकी तह में कुछ और बात ज़रुर थी। मीना ने रश्मि से बैठने को कहा और भीतर जाकर इंतजार करने लगी कि कब रश्मि जाए और वो अमिष के चेहरे के उड़े रंग की असल वजह जान सके।

Tuesday, October 04, 2005

भाग 17 : मयकशी में खुशी

दिल्ली के पटेल नगर इलाके एक एलआईजी फ्लैट में महफ़िल सजी थी। यहां चार मयक़श जमे थे और मय, मीना, सागर सबका इंतज़ाम किया गया था। कमी थी तो बस साक़ी की। जितेन्द्र ने शहर में ड्राई डे होने के बावजूद दिल्ली-यूपी बॉर्डर से दारु की जुगाड़ की थी। दरअसल, आज की महफ़िल का बस एक मकसद था- चापलूसी। चापलूसी केकेके की। हालांकि, जितेन्द्र ने केकेके को एक कमसिन कली मुहैया कराने का वादा किया हुआ था लेकिन आज के लिए सिर्फ दारु का कार्यक्रम था। जितेन्द्र को चापलूसी का पहला फंडा बखूबी पता था। वो ये कि, जिसकी लल्लो चप्पो कर रहे हो, उससे बार बार मिलो। मिलने के बहाने खोजो। बस, इसी लाख टके के सिद्धांत पर अमल करते हुए जितेन्द्र ने पहली बार में सिर्फ जाम छलकाने की ही व्यवस्था की थी। केकेके के अलावा जितेन्द्र के दोनों साथी भी महफिल में मौजूद थे।
"केकेके ने पहला घूंट लेते हुए ही जितेन्द्र को शाबाशी दे डाली। वाह, मज़ा आ गया। एक तो ड्राई डे और उस पर इतनी धांसू दारु...मज़ा आ गया।"
महफ़िल में बैठे चारों शराबी आदतन शराबी नहीं थे। कुछ ऐश के तो कुछ तेश के दारुबाज थे। रोज़ नहीं पीते थे, इसलिए पीने का पूरा आनंद लेकर पीते थे।
केकेके की शाबाशी से खुश जितेन्द्र के हौंसले भी बुलंद थे। "सर, अभी तो ये शुरुआत है, थोड़ी देर में आप ज़न्नत में पहुंच जाएंगे। "
"क्या करेंगे,ज़न्नत में पहुंचकर गुरु, अगर वहां अप्सराएं ही न हो? " केकेके ने सवाल उछाल दिया।
जितेन्द्र ने केकेके को भरोसा दिलाया कि अप्सरा की खोज जारी है और जल्द ही उन्हें उसके दर्शन करा दिए जाएंगे। केकेके को भी इस बात की कोई जल्दबाजी नहीं थी। छलकते जामों के बीच तीनों केकेके को अपने अपने अंदाज़ में खुश करने मे जुटे थे। केकेके की तारीफों के पुल बांधे जा रहे थे और उनकी महानता के ज़िक्र में कई रिकॉर्ड ध्वस्त हो रहे थे। मेहमाननवाजी से खुश केकेके भी खुश हो लिए थे। बातों का दौर जारी था और केकेके अपने मूड में आ चुके थे।
"तुम लोग हस्तमैथुन करते हो क्या? " केकेके की तरफ से अचानक उछाले गए इस सवाल से तीनों हतप्रभ थे।
केकेके ने तीनों के चेहरों को पढ़ा और कहा-"अरे यार, तुम लोग इतना परेशान क्यों हो गए। अब करते हो तो बोलो नहीं तो छोड़ों। लेकिन मैं तो अभी भी हैंड प्रैक्टिस करता हूं। यार......औरत के साथ कितना भी बिस्तर गर्म कर लो... हैंड प्रैक्टिस का मज़ा कुछ और ही है। "
केकेके के सिर पर सुरूर हावी हो चुका था और वो सेक्स से जुड़े अपने तमाम अनुभवों को चटखारे लेकर बताने लगा। जितेन्द्र और उसके दोनों साथी भी अब इस बातचीत में शामिल हो चुके थे।
मयकशी के दौर के बीच इतनी रंगीन वार्ता में विघ्न पड़ा.....केकेके के मोबाइल के घंटी से। केकेके का नंबर को घूरा और काट दिया। लेकिन,दो पल बाद मोबाइल फिर घनघना उठा। इस बार, केकेके ने गुस्से भी फोन ऑन किया और कहा- कौन है?
लेकिन,दूसरी तरफ से आई आवाज़ ने केकेके के पैरों तले ज़मीन खिसका दी।
"मैं विशंभर नाथ बोल रहा हूं। कहां रहते हो तुम। कुछ पता भी रहता है तुम्हें। "हमारा हिन्दुस्तान" के पटना एडिशन के लिए संपादक के लिए अजय कुमार का नाम फाइनल हो गया है।"
विशंभर की इस सूचना के बाद केकेके का सुरुर लापता हो चुका था और बदन में अजीब सी फुर्ती आ गयी। वो उठ खड़ा हुआ और चीते की चाल से नीचे उतर लिया।....
सिर्फ इन्हीं शब्दों के साथ...."कल बात करता हूं तुम लोगों से"

Friday, September 23, 2005

भाग 16 - प्यार पर तलवार

अमिष अंडमान के टूर से लौटा तो एयरपोर्ट से सीधे घर पहुंचा। रश्मि को लेने उसके घरवाले आए थे, जबकि कैमरामैन सारा ताम-झाम लेकर दफ़्तर रवाना हो गया था। रात का सन्नाटा सनन-सनन बोल रहा था और इस सन्नाटे को तोड़ती दो-चार कुत्तों के आपसी वार्तालाप की आवाज़ रह-रहकर गूंज रही थी। इसी सन्नाटे के बीच अमिष चोरों की तरह घर में घुसा तो घड़ी की सुईयां चार के आकंडे के साथ गुत्थम-गुत्था थी। अमिष के पास घर के एंट्रेस गेट की दूसरी चाबी हमेशा रहती थी, लिहाज़ा घर में घुसने में उसे कोई परेशानी नहीं होनी थी। शायद इसलिए, उसने मीना को भी अपने आने की सूचना नहीं दी थी।

अमिष ने धीरे से बेडरुम के दरवाजे को खोला तो नाइट लैंप में भी उसे मीना की मादकता गज़ब ढ़ाती दिखी। आमतौर पर नाईटी पहनकर सोने वाली मीना सिर्फ़ ब्रा और बारमूडा में सोयी हुई थी। हालांकि, बिस्तर पर पड़ा गीला टॉवेल साफ बता रहा था कि वो रोज़ की तरह आज भी देर से सोयी थी। अमिष का मन तो हुआ कि उसे बांहों में भरकर जगा दे...लेकिन जिस्म की आग बुझाने से पहले उसने पेट की आग बुझाना ज़रुरी समझा।

अमिष ने फ्रीज में रखी बीयर के एक दो घूंट मारकर खाने के लिए कुछ टटोला तो उसे मिली.....? कामयाबी। अमिष को रायता और चावल पसंद थे और उसने इसी से अपनी भूख मिटाई। अमिष चेन्नई एयरपोर्ट पर अच्छी खासी नींद ले चुका था, इसलिए उसे नींद तो नहीं आ रही थी लेकिन थकान ज़रुर थी। अमिष ने अपना टॉवेल उठाया और बाथरुम की ओर बढ़ गया।

अमिष के लिए अंडमान का टूर शानदार रहा था। एक तो,अंडमान पर इस तरह की ट्रैवल सीरिज़ उसे पहली बार मिली थी, जिसे उसने बखूबी अंजाम दिया और दूसरा रश्मि पाठक। अमिष दस दिन के टूर के दौरान ही रश्मि के काफी नज़दीक आ चुका था। रश्मि के साथ जारवा की झोपड़ी में शुरु हुआ अफ़साना एक बार होटल के कमरे तक भी पहुंच चुका था। .......अमिष को एक पल के लिए पोर्ट ब्लेयर के होटल के कमरे में रश्मि के साथ साथ नहाना याद आ गया। अमिष ने मुस्कुराते हुए बाथरुम का दरवाजा बंद किया और नहाने बैठ गया।

हालांकि, सुबह के पांच बज चुके थे लेकिन अमिष और मीना, दोनों के लिए ही ये रात का वक्त था। पिछले कई साल से दोनों "इस वक्त " मुर्गे और उसकी बाग़ को चुनौती देते हुए खर्राटे लेने का रिकॉर्ड बनाते रहे थे, लेकिन घड़ी में सुबह के पांच बजते देखकर अमिष को कुछ अजीब से खुशी हुई। अमिष का एक पल के लिए मन हुआ कि वो चाय बनाए और मीना के पास ले जाकर कहे- Madam, Your bed tea is ready. Just wake up । अमिष ने सोचा, खिड़की से झांकती भोर की हल्की रोशनी के बीच दोनों चाय पीते हुए गप्पे मारें और पिछले दस बारह दिनों का हाल-चाल पूछें। लेकिन, तभी अमिष के दिमाग में जुल्फें खोलकर सिर्फ ब्रा पहले बिस्तर पर पड़ी मीना का चित्र उभर आया। अमिष ने ड्रांइगरुम की लाइट ऑफ की और पहुंच गया " काम करने "।

.....................अमिष ने बेड रुम के नाइट लैंप को भी आराम दे दिया और चोर तरीके से मीना के बदन से खेलने लगा। मीना की ब्रा गिर चुकी थी । अमिष ने अपनी अप्सरा के होठों से होंठ लगा दिए। मीना की नींद खुली गयी थी लेकिन वो अमिष के बदन की खुशबू पहचानती थी। मीना को भी काम क्रीडा में मज़ा आ रहा था लेकिन आज वो बेकफुट पर रहकर ही खेल का मज़ा लेना चाहती थी।....

घड़ी के दोनों कांटे तेज़ी से दौड़ लगा रहे थे और उसी तेज़ी से अमिष भी अपने "काम" को अंजाम देने में जुटा था लेकिन इसी दौरान बजी अमिष के मोबाइल की घंटी ने उसे बेकाबू कर दिया।......चंद सेंकेड बाद बदहवास से अमिष ने मोबाइल उठाया तो दूसरी तरफ से आवाज़ आई- हैलो सर, आई एम रश्मि हीयर.वेरी गुडमॉर्निंग। मुझे मालूम था कि अभी आप सोए नहीं होंगे।"

"हैलो रश्मि " अमिष ने धीरे से बुदबुदाया लेकिन मीना के कान तो मानो अपने सबसे बड़े दुश्मन का नाम सुनने को बेकरार थे। मीना के तन की आग बुझाए बिना बिस्तर से उठना अमिष को भारी पड़ने वाला था। अमिष मीना के स्वभाव से अच्छी तरह वाकिफ था, लिहाजा मीना के "कुछ भी " करने से पहले उसने फोन काटकर स्विच ऑफ कर दिया।

Sunday, September 18, 2005

भाग 15 : वादे के लिए

संजीव श्रीवास्तव के मोबाइल पर करीब छह मिस्ड कॉल पड़े थे। ऐसा नहीं था कि उन्होंने मिस्ड कॉल्स देखे नहीं थे, लेकिन उन्होंने जानबूझकर फोन उठाया नहीं। इनमें से पांच कॉल तो मीना ठाकुर के थे। संजीव ने मीना के साथ गुज़ारी रंगीन रात के दौरान कई वादे किए थे, जिन्हें अब उन्हें पूरा करना ही था। मीना के अलावा किसी दूसरी महिला ने उनसे वादे लिए होते तो वो शायद टाल जाते लेकिन मीना ? संजीव की आंखों में एक पल के लिए मीना के जिस्म का हर हिस्सा घूम गया। संजीव ने लंबी आह भरी और मुस्कुराते हुए मीना को फोन लगा दिया।
"क्या डार्लिंग, तुम्हारा एक फोन ही काफी होता है, पांच कॉल करने की क्या ज़रुरत थी ? कल रात का सुरूर अभी तक उतरा नहीं है, इसलिए हम सो रहे थे।" संजीव ने अपने अंदाज में सफ़ाई दी। लेकिन, मीना को शायद संजीव की इस अदा के बारे में बखूबी पता था, लिहाजा उसने सीधे सीधे सवाल जड़ दिया- "आप सोए...या खोएं.. मुझे मतलब नहीं है। आपको अपने वादे याद हैं या नहीं, जनाब आप मुझे सिर्फ़ यह बता दें।।"
संजीव को अच्छी तरह पता था कि मीना हर हाल में अपनी बात मनवा कर ही दम लेगी। इसलिए उसने मीना को छुट्टी देने की बात फौरन मान ली। संजीव ने मीना को आश्वासन दिया कि दो-दिन में वो बैठकर तय कर लेंगे कि मीना कब लंबी छुट्टी पर जा सकती है। साथ ही, संजीव ने मीना को साफ़ साफ़ बता दिया कि वो कोशिश तो पूरी करेगा लेकिन फिर भी पेट्रोल पंप वाला वादा पूरा करने में वक्त लग सकता है।
हालांकि, संजीव के लिए किसी को एक अदद पेट्रोल पंप दिलाना बड़ी बात नहीं थी लेकिन इन दिनों पेट्रोलियम मंत्रालय में जारी उठापटक और पिछले दिनों पेट्रोल पंप आवंटन में हुए घोटालों की जांच के बीच ये काम थोड़ा मुश्किल था। इसके अलावा, संजीव खुद पचड़े में भी नहीं पड़ना चाहता था। एक तरफ, मीना को दिया वादा था तो दूसरी तरफ ये तमाम उलझनें। इसी सोच विचार के बीच संजीव ने फोन उठाया और दोबारा मीना की घंटी बज उठी।
"मीना..संजीव दिस साइड। मैंने तुम्हारे शुक्ला जी के पेट्रोल पंप के काम के बारे में ही सोच रहा था। तुम ऐसा करो-मिस्टर शुक्ला को कल मेरे पास भेज दो।"
मीना ने धीरे से "ओके" कहा और मोबाइल बिस्तर पर पटक दिया। मीना और संजीव के बीच ये शायद अभी तक की सबसे छोटा वार्तालाप था। दोनों को एक दूसरे से कुछ काम नहीं भी होता था तो भी वो इधर-उधर की बातें कर ही लेते थे लेकिन आज की बातचीत के बाद संजीव को कुछ बुरा लगा।
संजीव ने भी फोन रखा और अख़बार खोल कर हेडलाइन्स पर नज़र दौड़ा दी। दुनिया की सबसे महंगी कार और नीचे बलात्कार....ये कैसे समाचार। संजीव को एक पल के लिए गुस्सा आ गया...पेज सेटिंग की कोई तमीज़ ही नहीं है। संजीव बुदबुदाया....। इसी दौरान, उसकी नज़र दो कॉलम की छोटी सी एक ख़बर पर पड़ी -"पेट्रोलियम मंत्रालय से कई अहम दस्तावेज चोरी " । संजीव ने उसी वक्त दफ़्तर फोन किया और पता किया कि किस रिपोर्टर ने ख़बर दी थी। रिपोर्टर का नाम पता चलने के बाद संजीव के दिमाग में मिस्टर शुक्ला का काम कराने की योजना तैयार हो चुकी थी। संजीव ने रिपोर्टर भानु प्रताप को फोन किया-
"वैल डन भानु, अच्छी ख़बर निकाली है पेट्रोलियम मिनिस्ट्री से। आज कई अख़बार पलटे मैंनें, सिर्फ अपने यहां यह ख़बर है।"
"जी हां सर, कल देर रात मेरे सोर्स ने ख़बर दी थी। कई दस्तावेज हैं सर। हाल ही में हुए घोटाले से जुड़े भी।" भानु ने अपनी तरफ़ से ख़बर को विस्तार से बताया।
"ठीक है, तुम ऐसा करो आज इसी स्टोरी पर एक जानदार एंकर लिखो। साथ में, पेट्रोलियम मिनिस्टर से भी बात करो। देखें क्या कहता है। और हां...घोटाले के मामले में जिन जिन लोगों के नाम सामने आए हैं, अगर उनसे जुड़े कागज़ात भी गायब हुए हैं तो इस बारे में एक अलग ख़बर तैयार करो, उसे पहले पेज पर छापेंगे। " संजीव ने भानु को निर्देश दिया और एक बार फिर मीना का फोन घनघना दिया।
"डॉर्लिंग...तुम्हारा काम हो गया समझो। शुक्ला जी से कहो...निश्चिंत रहें।"

Thursday, September 15, 2005

भाग 14 : के के के

दिल्ली की फिज़ा में जहां इन दिनों डेली न्यू मॉर्निंग अख़बार के चर्चे ज़ोरों पर थे, वहीं कुछ पत्रकारों के बीच हिन्दी के एक बहुत बड़े पत्र "हमारा हिन्दुस्तान " के पटना एडिशन शुरु होने की भी सरगर्मियां तेज़ थीं। "हमारा हिन्दुस्तान " देश का जाना माना अख़बार था और उसके नए संस्करण को लेकर हिन्दी पत्रकार बिरादरी खासी उत्सुक थी। दरअसल, दिल्ली में बिहार से आए पत्रकारों की अच्छी खासी फौज है। इनमें कुछ यहां आईएस बनने का सपना लिए पहुंचे तो कुछ मजबूरीवश लेकिन जब सपनों पर हकीकत का हथौड़ा पड़ा तो पत्रकार बन गए। ये बेहद रोचक तथ्य है-भारत में खासकर उत्तर भारत में आमतौर पर कहा जाता है कि जो कुछ नहीं बन पाता वो टीचर बन जाता है। इसी तर्ज पर पत्रकारों का भी उदाहरण दिया जा सकता है। खासकर हिन्दी पत्रकारों का। जो कहीं तोप न मार माए, दुनिया से डर जाए, आशिकी में लुट जाए, महबूबा के बाप-भाई से पिट जाए वो हिन्दी का पत्रकार बन जाए। इसे हिन्दी पत्रकारिता जगत की त्रासदी कहिए या बड़प्पन, लेकिन सच यही है कि हिन्दी का पत्रकार बनने के लिए किसी खास योग्यता की दरकार नहीं है। अगर सीधे सीधे शब्दों में कहें तो हिन्दी पत्रकार बनना बेहद आसान हैं अलबत्ता योग्य हिन्दी पत्रकार बनना उतना ही मुश्किल है, जितना आईआईटी या आईएस की परीक्षा पास करना।
भई, जब हर गली-कूचे से हिन्दी में कथित योग्य पत्रकारों की फौज निकल रही हो, ऐसे में एक नया संस्करण शुरु होना तो जश्न का मौका ही है। लिहाजा, पटना जाने के इच्छुक पत्रकार बिरादरी अपनी जुगाड़ सैट करने में जुट गई कि कौन सा बंदा उन्हें पटना की रेलगाड़ी में बैठा सकता है।
इसी सोचविचार में उलझे छपरा, हज़ारीबाग और पटनावासी तीन पत्रकार प्रेस क्लब में बैठे समाधान खोज रहे थे कि अचानक जितेन्द्र कुमार झा के चेहरे पर बिजली सी चमक दौड़ पड़ी। के के के .........। जितेन्द्र "वीर भारत " नाम के एक चिरकुट किस्म के अख़बार में सब एडिटर था लेकिन खुद को टाइम्स ऑफ इंडिया के एडिटर से कम समझना उसकी फितरत में नहीं था। लेकिन, चिरकुट अख़बार था, लिहाजा उसकी तनख़्वाह महज़ छह हज़ार रुपये ही थी। थोड़े बहुत गड़बड़झाले कर तीन-चार हज़ार रुपये और कमा लेता था। जाहिर है, जितेन्द्र की जेब हमेशा हल्की रहती थी। यही हाल उसके बाकी दो साथियों का भी था। ऐसे में केकेके का नाम सुनकर तीनों को कुहासे में किरण दिखायी दी। केकेके यानि कैलाश कुमार कांग। हिन्दी पत्रकारिता में जनाब का आगमन अपने पिता जी की वजह से हुआ था। केकेके के पिता "हमारा हिन्दुस्तान " के दिल्ली संस्करण में कई साल तक संपादक रह चुके थे। केकेके ने पत्रकारिता में पिता की विरासत यानी कलम तो संभाल ली थी लेकिन उसमें वो धार नहीं आ सकी थी। साथ ही, चरित्र के मामले में भी केकेके का विलक्षण व्यक्तित्व था। इन्हीं "खूबियों" की वजह से केकेके को निकट से जानने वाले लोग कुत्ता कमीना काईंयां भी कहा करते थे।
बहरहाल, केकेके की योजना पटना एडिटन में स्थानीय संपादक बनने की थी और इसके लिए वो वहां अपने कुछ पिट्ठू भेजने की जुगाड़ में था। जितेन्द्र को इस बात की भनक थी और वो केकेके को खुश करने के उपाय भी जानता था, लिहाज़ा प्रेस क्लब में बैठे बैठे ही उसने केकेके को मोबाइल पर फोन घनघना दिया।
"हैलो सर, जितेन्द्र बोल रहा हूं, वीर भारत से।"
"हां, जितेन्द्र, क्या हाल हैं। कैसे हो? "
"बस सर, गुज़र रही है जिंदगी। आपकी शरण में आना चाहते हैं लेकिन आप कहां भक्तों की सुनते हैं। "
"अरे नहीं यार, आजकल कुछ व्यस्त हूं। एक नए प्रोजेक्ट में लगा हूं। बस..... "
"सर, आप तो हमेशा व्यस्त ही रहते हैं। एक दिन का समय निकालें तो आपका चेला आपकी सेवा कर दे। एक बहुत बढ़िया चीज़ नज़र मे है मेरे। "
इससे पहले केकेके कुछ कहता, जितेन्द्र ने ब्रह्मास्त्र चला दिया- "सर, मना मत कीजिएगा। संडे को तो आप फ्री रहते होंगे, उसी दिन वक्त निकाल लीजिए। बंदे पर विश्वास कीजिए --दिल खुश हो जाएगा।.....मैं आपको लेने आ जाऊँगा सर। ओके सर, भक्त को आज्ञा दें। "
जितेन्द्र ने इतना कहते हुए फोन काट दिया। जितेन्द्र को पूरी उम्मीद थी कि केकेके का कमीनापन कमसिन कली के आगे काफूर हो जाएगा।

Sunday, September 04, 2005

भाग 13: झोपड़ी में सनसनी

अंडमान और निकोबार में शूटिंग का दौर शुरु हो चुका था। हालांकि, अमिष को छह दिन में तीनों एपिसोड़ की शूटिंग खत्म कर देनी थी लेकिन अंडमान की ख़ूबसूरती और ख़ूबसूरत रश्मि के साथ के चलते उसने अपना कार्यक्रम दो दिन और बढ़ा दिया। अमिष ने तय किया कि वो तीनों एपिसोड़ के अलावा एक खास एपिसोड़ अंडमान की आदिवासी जनजाति ज़ारवा पर भी बनाएगा। रश्मि ने भी उसकी इस योजना का उत्साह के साथ समर्थन किया। अमिष ने तय किया कि दिल्ली जाने से ठीक एक दिन पहले पोर्ट ब्लेयर से तीस किलोमीटर दूर उस समुद्र तट पर जाया जाएगा,जहां जारवा जनजाति के कुछ सदस्य देखे जा सकते हैं। उम्मीद के मुताबिक प्रशासन से अनुमति मिल गयी और जिलाधिकारी ने उनकी लिए एक सुरक्षा गार्ड भी मुहैया करा दिया।
"क्या जारवा जनजाति के लोग बिलकुल कपड़े नहीं पहनते हैं? रश्मि ने अमिष से पूछा। " रश्मि और अमिष इस खास आदिवासी पर एक स्पेशल कार्यक्रम की रुपरेखा लिए चल पड़े थे कि रश्मि के इस सवाल ने अमिष को एक पल के लिए असहज कर दिया।
"सुना तो है। देखा नहीं है। वो नंगे हो सकते हैं क्योंकि आदिवासी हैं पर तुम क्यों शरमा रही हो। " अमिष ने रश्मि के सवाल का जवाब उसकी झिझक में तलाश लिया।
हालांकि, कार में अमिष और रश्मि के साथ रामसिंह नाम का सुरक्षा गार्ड भी मौजूद था लेकिन अंग्रेजी में हुई इस संक्षिप्त बातचीत का रामसिंह पर कोई असर नहीं था। साफ था कि रामसिंह का अंग्रेजी में हाथ थोड़ा कमज़ोर था। अमिष ने इसे भांपते हुए इंग्लिश में ही रश्मि से पूछ डाला कि क्या वो नग्न आदिवासियों को शूट कर पाएगी और क्या उनके बारे में एंकरिंग करते हुए वो शरमाएगी नहीं?
रश्मि के नो कहते ही रामसिंह ने कहा-"यस। यस सर, यहीं गाड़ी रोक कर पार्क कर दीजिए। यहां से हमें पैदल चलना पड़ेगा। आदिवासी यहां से कुछ ही दूरी पर रहते हैं।" अमिष ने गाड़ी पार्क की और रश्मि को कैमरा यूनिट साथ लेकर चलने को कहा। इस बीच, रामसिंह ने अमिष को आदिवासियों के झोपड़ीनुमा घर दिखाए। अमिष ने उन्हें देखने की इच्छा जाहिर की तो रामसिंह ने ये कहकर मना कर दिया कि जारवा जनजाति हिंसक होती है और वो हमला कर सकती है। रामसिंह की बात सुनकर रश्मि को तो एक पल के लिए सांप सूंघ गया। अमिष ने रश्मि को कैमरा बाहर निकालने का निर्देश दिया और दोनों को आगे चलने के लिए कहा। हालांकि, अमिष को पता था कि जारवा हिंसक होते हैं लेकिन वो उनके घर के भीतर के नज़ारे को अपने कैमरे में कैद करने को बैचेन था। अमिष ने कैमरा उठाया और धीरे से झोपड़ियों की तरफ बढ़ चला। झाड़ियों के बीच बनी छोटी छोटी झोपड़ियों से महज आठ-दस फीट की दूरी पर खड़ा अमिष पूरी तरह चौकन्ना था लेकिन तभी कंधे पर चुभे नाखूनों ने उसके होश फाख्ता कर दिए। एक क्षण को उसे लगा कि वो आदिवासियों के कब्जे में आ चुका है। एक पल के तो उसे किसी फिल्म का सीन भी याद हो आया, जिसमें आदिवासी उला..उला...उले गाते हुए अपने शिकार को आग के पास बांधकर रख देते हैं। लेकिन, ये क्या? न कोई जारवा,न आग , न उसकी गर्मी, पीछे थी तो बस केवल रश्मि।
अमिष ने रश्मि को डांटना चाहा लेकिन आदिवासियों के आसपास होने की आशंका के चलते वो चुप रहा।
अमिष ने रश्मि का हाथ पकड़ा और धीरे से झोपड़ियों की तरफ बढ़ा। चार फीट की दूरी पर पहुंचने के बाद भी जब उन्हें कोई आहट नहीं सुनाई दी तो दोनों का हौंसला बढ़ गया। अमिष ने रश्मि का जोर से हाथ पकड़ा और एक झटके में दोनों झोपड़ी के भीतर पहुंच गए।
हालांकि, अमिष और रश्मि जारवा जनजाति के घरों का मुआयना करने वहां जा पहुंचे थे, जहां शायद कभी कोई पत्रकार नहीं पहुंचा था। लेकिन,इस दौरान एक ऐसी घटना हुई जो रश्मि और अमिष दोनों के साथ कभी नहीं हुई थी। वो ये कि दोनों अंदर घुसे तो छोटे से प्रवेश द्वार में एक साथ घुसने के चक्कर में आपस में ही टकरा गए और फिर अंदर रश्मि नीचे-अमिष ऊपर।
अमिष और रश्मि दोनों के लिए ये पल अप्रत्याशित था लेकिन इस शानदार मौके को अमिष हाथ से नहीं जाने देना चाहता था। रश्मि के गुलाबी होंठों को इतने पास से देखने का मौका उसे पहले कभी नहीं मिला था। रश्मि ने दो पलों के इस घटनाक्रम पर अपना कोई विरोध नहीं जताया तो अचानक अमिष का हौंसला बुलंद हो गया। अमिष ने रश्मि को कसकर पकड़ा और उसे किस कर लिया।
.....अब....झोपड़ी में सनसनी थी....एक नए उन्माद की सनसनी।

Wednesday, August 31, 2005

भाग 12 : आदि के ख़्वाब

इंडियन टाइम्स के दफ़्तर में पिछले दो दिनों से सिर्फ़ एक ही बात की चर्चा थी। वो थी- डेली न्यू मॉर्निंग नाम के एक अख़बार की। दरअसल, डेली न्यू मॉर्निंग नाम से एक नया अखबार दिल्ली और मुंबई में लांच होने वाला था। एक बड़े उद्योगपति राजाभाई ओबेराय के इस अख़बार के लिए भर्तियों का विज्ञापन दो दिन पहले ही शहर के सभी अख़बारों में प्रकाशित हुआ था। ओबेराय समूह स्टील,पेट्रोल और केमिकल्स के क्षेत्र में देश के अग्रणी व्यवसायी प्रतिष्ठानों में से एक था। हालांकि, मीडिया में इस समूह की दखल न के बराबर थी लेकिन जानकार मानते थे कि मीडिया के क्षेत्र में ओबेराय समूह जल्द ही पैठ बना लेगा।वजह-पैसों का अकूत भंडार और उसे खर्च करने की दिलेरी भी। यदि डेली न्यू मॉर्निंग ने बेहतरीन पत्रकारों को दोगुनी-तिगुनी तनख्वाह पर दूसरे अख़बारों से तोड़ लिया तो कौन माई का लाल क्या कर लेगा ?
मिस्टर बैनर्जी ने भी यही तर्क देते हुए आदित्य के सामने डेली न्यू मॉर्ऩिंग के विज्ञापन वाला अखबार पटका। “बोलो बरखुरदार, अगर दिलचस्पी हो तो बात करूं तुम्हारे लिए इस अख़बार में।”
“लेकिन, दो दिन पहले तो भर्तियों का विज्ञापन आया है। आप किससे बात करेंगे? आदित्य ने मासूमियत से अपना सवाल उछाला। ”
“बेटा, भारतीय मीडिया की अच्छायी कहो या बुराई, लेकिन सच यही है कि यहां भर्तियां बायोडेटा देखकर नहीं की जातीं, कॉन्टेक्ट्स से होती हैं। तुम्हारा पीआर अच्छा है तो नौकरी छोड़ना और पाना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन अगर तुम्हारा पीआर अच्छा नहीं है तो एक नौकरी पानी के लिए खून-पसीना एक हो जाता है। और...तुम्हारी जानकारी के लिए मेरा पीआर अच्छा है।“
आदित्य ने मिस्टर बैनर्जी को अपलक देखा और फिर मन ही मन सोचा कि सिर से यू हीं ये बाल नहीं उड़े हैं अंकल।
मिस्टर बैनर्जी ने विज्ञापन का अख़बार वहीं छोड़ा और आदित्य को नयी जॉब का ऑफर देकर वहां से निकल लिए।
आदित्य को इंडियन टाइम्स में काम करते हुए अभी कुछ महीने ही गुज़रे थे,लिहाज़ा वो इतनी जल्दी नौकरी बदलना नहीं चाहता था।लेकिन मन ही मन उसकी इच्छा पॉलिटीकल बीट पाने की भी थी। इंडियन टाइम्स में मीना ठाकुर जैसी जबरदस्त पत्रकार तो थी ही, पुराना अख़बार होने की वजह से दूसरे कई पत्रकार भी राजनीतिक ख़बरें कवर करते थे। ऐसे में, आदित्य को यहां पॉलिटीकल बीट मिलने में कई साल लग सकते थे। आदित्य के लिए सिर्फ एक यही तर्क मिस्टर बैनर्जी को फोन मिलाने के लिए काफ़ी था।
भारतीय मीडिया में एक बड़ी दिलचस्प बात ये है कि यहां पॉलटिकल बीट को सबसे महत्वपूर्ण समझा जाता है। राजनीति का कखग भी नहीं समझने वाले तथाकथित पत्रकार राजनीतिक ख़बरे ही कवर करना चाहते हैं। भूमंडलीकरण के दौर में आर्थिक पत्रकारिता बहुत अहम हो चली है लेकिन अगर युवा पत्रकारों से पूछो तो पता चलेगा कि सभी राजनीतिक पत्रकारिता में तुर्रम खां होना चाहते हैं। आदित्य भी ऐसा ही तुर्रम खां बनना चाहता था। उसकी भी दिली इच्छा थी कि उसके फोन करने पर बड़े से बड़ा नेता लाइऩ पर आ जाए या उसके कहने भर से कई काम हो जाए। लेकिन, दूसरे तुर्रमों से वो इस मायने में अलग था कि उसे राजनीतिक समझ थी।
“ठीक है बरखुरदार। मैं कल बात करुंगा तुम्हारे लिए। ” आदित्य के फोन का मिस्टर बैनर्जी ने संक्षिप्त में यही जवाब दिया।
आदित्य ने अपना काम खत्म किया और ऑफिस से बाहर निकल लिया। मिस्टर बैनर्जी के अऩुभव में सिर से उड़े हुए बाल औऱ उऩका जबरदस्त आत्वविश्वास देखखर आदित्य को भी भरोसा हो चला था कि मिस्टर बैनर्जी एक बार फिर उसके लिए देवदूत साबित होंगे।

Monday, August 22, 2005

भाग 11-वादों का बिछौना

संजीव और मीना फ्लैट में दाखिल हो चुके थे। रात के दूसरे पहर की खामोशी बोल रही थी। अपने ड्राइंगरुम की बत्ती ऑन करते हुए सन्नाटे को तोड़ा मीना ने-“ जनाब, कुछ खाएंगे-पीएंगे ? क्या प्रोग्राम है आपका? ”
पार्टी में पी मदिरा का सुरूर अब तक सिर चढ़ चुका था। संजीव ने पहले मीना को एक टूक देखा और फिर अपने जवाब के तौर पर प्रस्ताव रखा डाला- “तुम्हारे होंठों से शराब पीने की चाहत है बंदे की। उसका इंतज़ाम कर दो तो खुदा क़सम आज जन्नत मिल जाए। ”
समझदार को इशारा काफ़ी होता है। मीना तो इस दीन-दुनिया में समझदारी का बहुत ऊँचा पायदान चढ़ चुकी थी। उसने ड्राइंगरुम की बत्तियां बंद कर दीं और खुद बेडरुम में पहुंच गई। बेडरुम में रखे लैंडलाइन फोन पर अमिष के दो मिस्ड कॉल्स की सूचना थी। अमिष ने पार्टी के दौरान मीना के मोबाइल पर भी फोन किए थे, लेकिन शायद उसकी घंटियां उसे सुनायी नहीं दी। अमिष के मिस्ड कॉल के बारे में मीना जब तक कुछ सोच पाती, बाहर संजीव के मोबाइल की घंटी थर्ऱा उठी। रात के दो बजे....कौन हो सकता है....मीना का दिल एक मिनट को दहल उठा।
“नो डार्लिंग...अभी पार्टी में ही हूं। सारा इंतज़ाम देखना पड़ता है। तुम ऐसा करो...आराम से सो जाओ। मैं भी सुबह आ जाता हूं। बाय....एंड टेक केयर ” संजीव ने ये कहकर अपना मोबाइल ऑफ कर दिया।
मीना समझ गई कि रात के दो बजे मिसेज श्रीवास्तव के फोन ने शांति भंग की थी। मीना ने कपड़े बदले और संजीव को आवाज़ दे डाली-“एडिटर साहब..आपको सोना नहीं है क्या?”
बेडरुम की बत्तियां बद थीं। बिस्तर पर मीना और संजीव-दोनों एक दूसरे की आहट महसूस कर रहे थे। शब्द लापता थे और दोनों के बीच मानो मौन पहरा दे रहा था। संजीव की एकबारगी इच्छा हुई कि वो मीना से बत्तिया जलाने को कहे ताकि वो उसके खूबसूरत गदराते जिस्म के दर्शन कर सके। लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हुई। मीना कभी-कभार ही उस पर इस तरह मेहरबान होती थी, लिहाज़ा मौका गंवाना उसे कुबूल नहीं था। संजीव ने अंधेरे में ही मीना के अधरों को चूमते हुए जांघों तक का सफ़र तय कर डाला।
मीना की मखमली जांघों पर हाथ पहुंचते ही संजीव की धड़कने शताब्दी की रफ्तार से दौड़ने लगीं। आंखों की नींद देश छोड़ चुकी थीं और उत्तेजना काबू से बाहर होती जा रही थी। मीना को भी मानो इसी पल का इंतज़ार था। हालांकि, “काम” में संजीव की कामना देख उसे मज़ा आ रहा था लेकिन यही पल शायद उसके काम का भी था। उसने अचानक संजीव को अपनी बांहों में भर लिया और पूछा- “मज़ा आ रहा है जनाब?”
संजीव के पास हां के अलावा कोई जवाब भी नहीं था। वो पूरी तरह उत्तेजित था। लेकिन मीना को मालूम था कि उसे क्या करना है।
“लेकिन साहब,पूरा मज़ा लेने के लिए आपको दो वादे करने होंगे। आप ऑफिस में मेरी सुनते नहीं है। इसलिए अभी कहना ज़रुरी है। पहला वादा ये कि कल आप पेट्रोलियम मिनिस्टरी में बात करेंगे मिस्टर शुक्ला के काम के लिए। उनका पेट्रोल पंप का मामला काफी दिनों से अटका हुआ है। और दूसरा ये कि अब मुझे बीस दिन की छुट्टी चाहिए। कदम का दम मैं निकाल चुकी हूं औऱ मुझे अब कुछ दिन आराम चाहिए। वैसे...भी आज तो मैं और ज़्यादा थकने वाली हूं।” मीना ने अपने शरारती अंदाज़ में संजीव के सामने अपनी बात रख डाली।
संजीव के पास इस बार भी “हां” के अलावा कोई जवाब नहीं था। फोर प्ले ज़ारी था और भोर नज़दीक । अब तक दोनो तरफ़ वासना की आग बेकाबू हो चुकीथी। चादर बिस्तर से गिर चुकी थी और पहरा देता मौन रफ़ूचक्कर हो चुका था। दरअसल, दो जिस्मों के एक होने के दौरान कुछ आवाज़ें ज़रुरी जो होती है................................।

Tuesday, August 16, 2005

भाग दस: अंडमान का संग

पोर्ट ब्लेयर के एयरपोर्ट पर उतरते ही अमिष और रश्मि को अहसास हो गया कि ये जगह उससे कहीं खूबसूरत है,जितना की कहा जाता है। छोटा से एयरपोर्ट टर्मिलन पर महज एक और विमान खड़ा था। एयरपोर्ट पर सुरक्षा के ज़्यादा तामझाम नहीं थे। अमिष, रश्मि और उनका कैमरामैन सुनील आधे घंटे के भीतर ही टर्मिनल से बाहर सड़क पर खड़े थे। उनके लिए टैक्सी का इंतज़ाम पहले से किया जा चुका था और वो तीनों टैक्सी में बैठकर पोर्ट ब्लेयर के बीचों बीच बने होटल गैलेक्सी की तरफ़ रवाना हो गए।
होटल में रश्मि के लिए अलग कमरा बुक था। चौथी मंज़िल पर कमरा नंबर 404 । खिड़की से बाहर समुन्दर का हसीं नज़ारा उसे रह रहकर बाहर जाने के लिए प्रेरित कर रहा था। रश्मि समुंदर के दिलकश नज़ारे का लुत्फ ले ही रही थी कि दरवाज़े के बाहर खटखट ने उसका ध्यान भंग कर दिया।
"रश्मि,आई एम अमिष आउटसाइड। डू यू वांट टू कम विद मी? मैं कल की शूटिंग के लिए लोकेशन देखने जा रहा हूं। "
"यस सर। मैं आपके साथ आ रही हूं। आप नीचे चलिए, मैं एक मिनट में तैयार होकर आ रही हूं।" रश्मि ने कमरे के भीतर से ही जवाब दे दिया।
पल भर बाद रश्मि और अमिष होटल के लांज में आमने-सामने खड़े थे। रश्मि की खूबसूरती का अमिष पहले से ही कायल था लेकिन गुलाबी टॉप और दूधिया रैप अराउंड पहने रश्मि खूबसूरती की हर उपमा को बेमानी कर रही थी। अमिष ने धीरे से कहा- "यू आर लुकिंग गार्जियस। बहुत खूबसूरत दिख रही हो तुम।"
रश्मि धीरे से मुस्कुरायी और फिर दोनों नज़दीक के बीच पर चल दिए। रश्मि ने टेलीविजन कार्यक्रमों के लिए एकंरिग कई बार की थी लेकिन एकंरिग के लिए शहर से बाहर अकेले पहली बार आई थी। लिहाज़ा, बार बार संकोच की एक रेखा उसके चेहरे पर झलक पड़ती थी। अमिष यह बात भांप चुका था। उसने अचानक रश्मि का हाथ पकड़ा और बैठा बैठा दिया।
रश्मि पहले तो चौंकी लेकिन फिर संभलती हुए उसने पूछा कि आखिर क्या बात है।
अमिष ने कहा-"देखो,पहला शॉट यही लेंगे। तुम इसी ड्रेस में इसी साहिल पर खुद का परिचय देते हुए कहोगी कि-आईने की तरह साफ ये समुन्दर, नरम ये रेत, दिलकश मौसम और मैं आपकी दोस्त रश्मि पाठक। कुदरत की बनायी इस जन्नत का नाम है-अंडमान।हम अगले तीन एपिसोड तक आपको यहां और आसपास के टूरिस्ट स्पॉट, लोगों की जिंदगी और खान पान से जुड़ी तमाम जानकारियां देंगे। वगैरह वगैरह। "
अमिष ने स्क्रीप्ट की मोटी मोटी चंद लाइनें रश्मि को बताई। रश्मि अमिष के बताने के अंदाज़ और अपने कार्यक्रम को लेकर उसकी उत्सुकता से प्रभावित थी।
अमिष को अंडमान-निकोबार पर तीन एपिसोड़ तैयार करने थे। पहला,अंडमान की खूबसूरती के बारे में, दूसरा निकोबार समेत दूसरे द्वीपों के बारे में और तीसरा अंडमान-निकोबार की जनजातियों के बारे में। अमिष ने अंडमान पहुंचने से पहले वहां के बारे में खासा अध्ययन किया था, लिहाज़ा पूरे इलाके के बारे में उसकी किताबी जानकारी जबरदस्त थी। इस बात का अंदाज रश्मि को हो चुका था।
शाम के सात बज चुके थे। अमिष और रश्मि, दोनों का बदन थककर टूट रहा था। अमिष ने रश्मि से पूछा कि क्या वो थकान उतारने के लिए वाइन वगैरह पीना चाहेगी तो रश्मि का जवाब न में था।
अमिष ने रश्मि को होटल के लांज में छोड़ दिया और खुद बार की तरफ चल दिया।

Wednesday, August 10, 2005

भाग नौ : पार्टी..डांस..मस्ती

ली मेरेडियन का सेंटर हॉल दुल्हन की तरह सजा था। पार्टी की रंगत साफ दिखायी दे रही थी। पार्टी में मौजूद ज़्यादातर लोगों के हाथों में जाम थे। खास बात ये कि शराब का सुरूर लोगों पर चढ़कर बोले,इसके लिए साकी का इंतज़ाम भी किया गया था। डांस फ्लोर पर तिल रखने को जगह नहीं थी।लोग जमकर नाच रहे थे और जो नाच नहीं रहे थे,वो दिल में किसी दिलकश सुंदरी को बांहों में लिए नाचने का ख्वाब देख रहे थे।
कजरारे कजरारे रे...तेरे कारे कारे नैना...........सदा में गूंजते इस तराने पर डांस फ्लोर पर लोगों की मस्ती देखने लायक थी कि अचानक संजीव श्रीवास्तव की मौजूदगी ने फ्लोर पर जगह पैदा कर दी। दरअसल, संजीव मीना का हाथ थामे फ्लोर पर पहुंच चुके थे।मीना खूबसूरत तो थी ही,लेकिन पार्टी के दिन मानो उसकी खूबसूरती को चार चांद लग गए थे।वो साड़ी पहन कर इतनी दिलकश लग रही थी कि वहां मौजूद कई कमसिन हसीनाओं को पसीना छूट रहा था। ऐसे में फ्लोर पर मीना ने जब अपनी बलखाती कमर के झटके दिखाए, तो देखने वाले दंग रह गए। लोगों को इस बात का कतई अंदाज़ नहीं था कि अपनी कलम से बड़े बड़ों के छक्के छुड़ाने वाली इस नाज़नीन को झूमना भी आता है। मीना ने ज़्यादा नहीं पी थी लेकिन डांस फ्लोर पर उसे नाचता देखकर यही लग रहा था कि जैसे उसने आज दिलखोल कर पी है। संजीव भी बस उसे ही देखे जा रहा था।
पार्टी की इसी तड़क भड़क के बीच एक 23-24 साल का नौजवान ऐसा भी था, जो हाथों में कोल्ड ड्रिंक का गिलास पकड़कर किन्हीं ख्यालों में खोया हुआ था। ऐसा मालूम होता था कि स्वर्ग की अप्सराओं की बीच या तो कोई संन्यासी था या नपुंसक। उसकी ख़्यालों के गाड़ी पर अचानक एक वेटर ने ब्रेक लगाया।
“कुछ लेंगे सर?”
“नो थैंक्स ”।24 साल के उस नौजवान ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। इस नौजवान का नाम आदित्य शर्मा था। इंडियन टाइम्स में ज्वाइन किए उसे अभी तीन महीने ही हुए थे। वो रिपोर्टर था और फिलहाल उसे एजुकेशन बीट का जिम्मा दिया गया था।
“क्या बात है आदित्य। किन ख्यालों में खोए हुए हो। मैं बहुत देर से देख रहा हूं, तुमने कुछ लिया भी नहीं।” न्यूज एडिटर दिलीप बैनर्जी ने आदित्य के पास से गुज़रते हुए पूछा।
“नहीं सर,ऐसी कोई बात नहीं है। ”
“देखो बरखुरदार,हम उड़ती चिड़िया के पंख गिन लेते हैं।तुम तो अभी उड़ना भी नहीं सीखे हो।”
दरअसल, दिलीप बैनर्जी ही वो शख्स थे, जिन्होंने आदित्य का सीवी संजीव श्रीवास्तव को दिया था।दिलीप आदित्य के पिता के अच्छे दोस्तों में थे और आदित्य के पिता के निधन के बाद से उसके परिवार का हाल चाल लेते रहते थे।
“सर, एक उलझऩ थी। उसी से जूझ रहा था। लेकिन,ये वक्त उस पर बात करने का नहीं है।मैं आपसे कल बात करुंगा।आज आप पार्टी इन्जॉय कीजिए” आदित्य ने दिलीप बैनर्जी के सभी सवालों को यही जवाब दिया।
उधर,डांस फ्लोर पर तापमान लगातार बढ़ रहा था। मीना की ज़ुल्फें खुलकर बिखर चुकी थीं और पसीने से तर-बतर संजीव का कोट हवा में लहराने के बाद एक जूनियर सब एडिटर के कंधों की शोभा बढ़ा रहा था।
मस्ती का समां रुका तो घड़ी रात के ढ़ाई बजा चुकी थी। कुछ खबरनवीस टल्ली होकर सोफे-कुर्सी पर जम गए थे,तो कुछ किसी का दामन पकड़े घर जाने की जुगाड़ लगा रहे थे।..... दिल्ली में रात में कितने खतरनाक हादसे हो रहे हैं, इसका उदाहरण देते हुए संजीव भी मीना के साथ हो लिए। मीना घर पहुंची तो पूरी सोसाइटी में सन्नाटे बोल रहे थे।इस खामोशी के बीच ही मीना और संजीव कुछ पल तक आंखों से बातें करते रहे। अचानक...मीना ने संजीव का हाथ पकड़कर कहा-अंदर नहीं आओगे क्या?

Sunday, August 07, 2005

भाग आठ : ;चैनल टू की रश्मि

दोपहर के दो बज रहे थे। दिन के दूसरे पहर तक चैनल टू के ऑफ़िस में सरगर्मियां नदारद थी। जो रिपोर्टर दफ़्तर में थे, वो गप्प लड़ा रहे थे,जबकि डेस्क वाले किसी बड़ी ख़बर के न आने की दुआ मांगते हुए घर जाने का इंतज़ार कर रहे थे। हालांकि,समाचारों की इस हलचली दुनिया के सन्नाटे में अमिष का काम जारी थी।उसे अगले महीने की शुरुआत से ही एक खास ट्रैवल शो शुरु करने का जिम्मा सौंपा गया था। शुरुआत कश्मीर की हसीं वादियों से होनी थी, जिसे लद्दाख होते हुए अंडमान में समुन्दर में समाना था। तीस एपिसोड के इस शो की रुपरेखा तैयार करने से लेकर उसकी स्क्रिप्ट लिखने,एंकर तय करने और फिर सही वक्त पर प्रोमो चलवाने तक का जिम्मा अमिष का ही था। अमिष को इतनी बड़ी जिम्मेदारी पहली बार सौंपी गई थी,लिहाज़ा उसका चिंतित होना लाज़िमी था।
अमिष ने लोकेशन के बारे में सोच रखा था। स्क्रिप्ट का भी मोटा मोटा अंदाज़ उसे था। लेकिन,वो एंकर के बारे में तय नहीं कर पा रहा था।उसे एक ऐसी एंकर की तलाश थी,जो कश्मीर की कुर्ती से लेकर चेन्नई की साड़ी तक में न सिर्फ़ खूबसूरत लगे बल्कि सेक्सी भी लगे। वो चेहरा ऐसी कशिश पैदा करे कि दर्शक की निगाह एक पल के लिए ठहर जाए। दरअसल, अमिष की स्पष्ट धारणा थी कि टेलीविज़न आकर्षक चेहरे-मोहरे वालों का माध्यम है।दर्शक पहले खूबसूरत-आकर्षक चेहरे को देखकर रुकता है और फिर कंटेंट में दम हो तो ठहरता है।लेकिन...चैनल टू में क्या कोई ऐसा चेहरा है ?
अमिष ऐसे चेहरे की तलाश को लेकर अपने मन के घोड़े दौड़ा ही रहा था कि उसे पीछे से एक आवाज़ सुनाई दी।
"हैलो सर, आई एम रश्मि....। रश्मि पाठक । मैं मिस्टर अमित कुमार के रिफ़रेंस से आपके पास आई हूं।उन्होंने मुझे बताया था कि आपको एक एंकर की तलाश है।"
अमिष ने रश्मि का धीरे से अभिवादन किया लेकिन उसी एक पल में उसने इस नाज़नीन को निहार लिया। खूबसूरत,शोख,हसीं,दिलकश जैसी तमाम उपमाएं अचानक उसके जुबां पर आकर ठहर गईं।अमिष ने रश्मि को बैठने का इशारा करते हुए कहा- "अपना बायो डेटा लाई हैं आप? "
रश्मि ने मुस्कुराते हुए अपना बायो डेटा अमिष की तरफ बढ़ा दिया। हालांकि,रश्मि के CV में वो सब था, जिससे उसे एंकर की जॉब मिल सकती लेकिन हकीकत यह थी कि अमिष ने उसे देखते ही तय कर लिया था कि वो ही उसके शो की एंकर होगी।
रश्मि का औपचारिक सा साक्षात्कार लेने के बाद अमिष ने उससे जाने को कह दिया।

Saturday, August 06, 2005

A REQUEST

Dear Readers,
It feels great when someone notice your creative work. Though, this is totally popular writing but I think that readers have liked it. When I had started this blog “Pages123- An Inside Story Of Media”, I was not sure about readers response. Today, I am happy that Hindi readers are reading my blog and reacting on it. But It is not enough. I have a data about readers number but didn’t get that much comment. I want to say all of my readers that please comment on blog. Though, this is transcription of a screenplay but we had written screenply for only 7-8 episode. Yes, the story of Inside story of Media was in our mind. So, Please tell me your view, so that I could decide about this blog’s future.
ThanksPuru

Tuesday, August 02, 2005

भाग सात : लेट्स इन्जॉय

आज ऑफ़िस में अजीब सा सन्नाटा पसरा था। ऑफ़िस ब्यॉय सभी वक्त पर अपनी यूनिफ़ॉर्म में मौजूद थे और सभी निर्देशों का तत्काल पालन किया जा रहा था। कंप्यूटर की बोर्ड से उंगलियों के मिलाप की आवाज़ भी रह रह कर गूंज रही थी।घड़ी अपनी रफ़्तार से दौड़ रही थी लेकिन संपादक संजीव श्रीवास्तव के केबिन के बाहर बैठे सभी रिपोर्टर,सब एडिटर और दूसरे कर्मचारी सांस रोके केबिन की तरफ नज़र गढ़ाए बैठे थे। दरअसल,इंडियन टाइम्स के मालिक प्रह्लाद कुमार आज काफ़ी दिनों बाद ऑफ़िस पहुंचे थे। उन्होंने आते ही संजीव श्रीवास्तव और मीना ठाकुर को बुला भेजा। उनके चेहरे के भाव साफ़ कह रहे थे कि मामला कुछ गड़बड़ है।
"आप लोग अब इतने बड़े पत्रकार हो गए हैं कि एक मिनिस्टर को ऐसी तैसी करने से पहले आप मुझे बताना तक ज़रुरी नहीं समझते? आज आपने कदम का दम निकाला है, कल आप किसी और की ले लेंगे। कुछ चंडूखाने की ख़बर भी आप छाप सकते हैं।"
"सर,पूरी तहकीकात के बाद ही हमने कदम के बारे में रिपोर्ट छापी है।मीना ने पूरे दो हफ़्ते तक इस रिपोर्ट पर काम किया है।घोटाले से जुड़े सारे दस्तावेजों की फोटो कॉपी हमारे पास है।"
"लेकिन,मैं पूछ रहा हूं कि एक मिनिस्टर की झंड करने से पहले क्या आप अख़बार के मालिक को बताना तक ज़रुरी नहीं समझते? मेरे पास कल रात में होम मिनिस्टर का फ़ोन आया था। पूछ रहे कि थे क्या पूरे सबूतों के साथ ख़बर छापी गई है या.....। अब अपन को कुछ पता हो तो उन्हें बताऊं"
"सॉरी सर। " संजीव श्रीवास्तव के पास प्रह्लाद कुमार के विष बुझे सवालों की बस एक यही ढाल थी।
"सॉरी...सर..वी विल टेक केयर इन फ़्यूचर " मीना ने भी धीरे से खेद प्रकट कर डाला।
सॉरी की लोरी सुनकर प्रह्लाद कुमार का क्रोध कुछ शांत हुआ। मीना की क़ातिल मुस्कुराहट में उनके गुस्से पर और पानी डाला।संजीव ने भी हालात को समझते हुए फौरन तीन कॉफी का ऑर्डर दे दिया।
"लाइए...सारे दस्तावेज दिखाइए। किस आधार पर आप लोगों ने कदम और उसके पीए की कहानी झंड की है।"
संजीव ने अपने लॉकर से सारे दस्तावेज प्रह्लाद कुमार के सामने रख दिए।मीना ने भी उनमें से खास कागजों को ऊपर रख दिया। प्रह्लाद कुमार ने उनपर गंभीरता से नज़र मारी और फिर सारे डॉक्यूमेंट समेट कर संजीव के हाथ में धर दिए।
"वेल डन। गुड वर्क। मज़ा आ गया। "
"यू पीपल हैव डन फेन्टास्टिक जॉब। इस बात पर एक पार्टी होनी चाहिए। अगले संडे को एक पार्टी का ऐलान कर दो। ली मेरेडियन में। हां..लेकिन अब आगे से ध्यान रखना कि ऐसी कोई भी इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट कवर करने से पहले मुझसे पूछ लिया करो।"
प्रह्लाद ने संजीव की तरफ़ मुस्कुरा कर देखा और केबिन से बाहर निकल लिए। संजीव ने शरारती अंदाज़ से मीना को निहारा और उसे इशारा करते हुए प्रह्लाद कुमार के पीछे भागा।....बॉस आई एम कमिंग.......................

Wednesday, July 27, 2005

भाग छह :कुल्लू की कुंठा

"साला,भगवान जब पैसा देता तो छप्पर फाड़ कर देता है। आदमी एक झटके में चिरकुट से चंपक लाल बन जाता है।" फाइव स्टार होटल के आलीशान सूट में बैठा कुल्लू लक्ष्मीपतियों के बारे में अपने अंदाज़ में चिंतन कर ही रहा था कि एक आवाज़ ने उसके ध्यान में खलल डाल दिया।
"हाई....हाऊ आर यू डूइंग? आई एम सॉरी....मैंने आपको इंतज़ार कराया।" मल्लिका ने अपनी क़ातिल मुस्कान के साथ कुल्लू से खेद ज़ाहिर कर दिया।
हांलाकि, कुल्लू ने अपने फिल्मी पत्रकारिता के करियर में जवां दिलों की धड़कन माधुरी दीक्षित और ऐश्र्वर्या राय से लेकर सेक्सी बिपाशा बसु तक सैकड़ों अभिनेत्रियों के वन टू वन इंटरव्यू किये थे लेकिन मल्लिका को देखकर उसे लगा कि वो सभी सिर्फ़ नाम की हुस्न परियां हैं। असली हुस्न परी तो सिर्फ़ एक है-वो है मल्लिका। कुल्लू एक बार पहले भी मल्लिका से मिल चुका था लेकिन तब उसमें वो बात नहीं थी। आज की मुलाकात ही कुछ अलग थी। कुल्लू को मल्लिका का हुस्न संगमरमर की तरह चिकना दिखायी दे रहा था। उस पर मल्लिका के अंदाज़-ए-बयां सोने-पे-सुहागा।
हालांकि,सूट का कमरा काफी बड़ा था लेकिन वहां सिवाय थोड़े फर्नीचर के और कुछ नहीं था।लगभग खाली कमरा..उस पर एक सोफे पर हुस्न परी और कुल्लू साथ...। बातों बातों में मल्लिका ने दो-तीन बार कुल्लू के हाथों पर हाथ रख दिया तो कुल्लू की सारी इंद्रिया एक साथ उछाल मारने लगीं।महज़ एक-सवा फीट की दूरी से ऐसी खूबसूरत महिला को निहारने का अनुभव.... जिसने जैसे तैसे अपने उरोजो और जांघ को ढकने के लिए वस्त्र पहने हों...उफ़....कुल्लू की फ़िल्म पत्रकारिता मानो एक झटके में मल्लिका ने अपनी जांघों के नीचे से निकाल दी।
इंटरव्यू खत्म हो गया। कुल्लू ने ऑफिस की तरफ अपनी गाड़ी दौड़ा दी। कुल्लू के मल्लिका को धोने के सब अरमां उसकी क़ातिल अदाओं में बह चुके थे। कुल्लू को इंटरव्यू आज ही फाइल करना था। कल छपना ही था।आखिर.एक्सक्ल्यूसिव इंटरव्यू जो था।कुल्लू ने अपनी डेस्क पर कंप्यूटर ऑन किया और दबे होंठों से चार छह गालियां बुदबुदा डाली। बहुत सोचा था कि मल्लिका से ऐसे सवाल पूछेगा कि उसकी अक्ल ठिकाने आ जाएगी लेकिन हुआ क्या-झांट?
कुल्लू ने जैसे तैसे इंटरव्यू पूरा किया। लेकिन मज़ा नहीं आया। मज़ा आता तो कैसे ? इंटरव्यू में सिवाय मल्लिका की खूबसूरती और भावी योजनाओं का ही तो ज़िक्र था। कुल्लू ने कोई ऐसा सवाल पूछा ही नहीं था तो फिल्मी पत्रिकाओं से हटकर हो।जिसमें दम हो।
रात का एक बज चुका था। कुल्लू ने इंटरव्यू खत्म किया और फीचर पेज़ के इंचार्ज को बता दिया। चार हज़ार करेक्टर का स्पेस उसने पहले ही छुड़वा दिया था। हालांकि..इंटरव्यू में ऐसा कुछ खास नहीं था,जिसे पढ़ने में उसे मज़ा आए लेकिन फिर भी उसने पूरा इंटरव्यू दोबारा पढ़ा और एक बार हेडलाइन पर नज़र डाली।हेडलाइन थी- जितना खूबसूरत जिस्म है उतना ही दिल भी।
कुल्लू को खुद पर कोफ़्त हुई। वो आखिर क्यों मल्लिका के मखमली जिस्म से आगे कुछ सोच नहीं पा रहा था ? बार बार उसे मल्लिका का बदन,उसकी अदाएं और अपनी जांघों पर उसका हाथ नज़र आ रहा था। ऑफिस से तकरीबन सभी लोग जा चुके थे और उसके केबिन के आसपास तो कोई भी नहीं था,जिससे वो बतिया सकता।हां..सामने रखे एक टेलीविजन पर ज़रुर स्टार मूवीज़ पर एक फिल्म चल रही थी।मल्लिका की सोच से उबरने का कुल्लू को कोई ज़रिया नहीं सूझ रहा था।
थोड़ी देर बाद......कुल्लू की कुंठा....उसकी पेंट में ढेर हो चुकी थी। कुल्लू ने लंबी सांस ली और घर की तरफ निकल पड़ा।

Saturday, July 23, 2005

भाग पांच- कदम का दम

रविवार का दिन दफ़्तर के बाहर जितना सन्नाटा लिए था, इंडियन टाइम्स के दफ़्तर में उतनी ही ज़्यादा सरगर्मी थी। दफ़्तर में जारी सरगोशियों से बखूबी समझा जा सकता था कि सोमवार यानि कल कोई धमाका होने वाला है। एडिटर संजीव श्रीवास्तव का हर दो पल बाद न्यूज़ एडिटर को बुलाना और फिर हर पंद्रह मिनट बाद पेज लेआउट रुम में जाना ये साबित कर रहा था कि कल धमाका होना ही है। इसी बीच,मीना ठाकुर तीर से तेज़ चाल के साथ एडिटर के केबिन में जा घुसी।
“ क्या बॉस. आ गया न मज़ा? मीना ने पूछा ”
“ तुम्हारे साथ कोई भी काम करना हो,मज़ा आ ही जाता है।” संजीव के ‘काम’ शब्द पर दिए अतिरिक्त ज़ोर ने दोनों के चेहरों पर मुस्कान बिखेर दी।
“कल...लीड स्टोरी है तुम्हारी।चारों तरफ रिएक्शन होंगे। तुम अब एक फॉलोअप स्टोरी की तैयारी कर लो।आखिर...मुद्दा मिल गया है तो इस कहानी की बूंद बूंद चूस लेंगे।और हां...मुझे पता है कि कदम तुमसे संपर्क करने की हर मुमकिन कोशिश करेगा,इसलिए इस स्टोरी के खत्म होने तक तुम अपने घर नहीं सोओगी। मैंनें फीचर एडिटर रश्मि सक्सेना से बात कर ली है, तुम उसके साथ रहो। अमिष आजकल शहर में ही है क्या?” संजीव ने मीना को निर्देशों का पुलिंदा थमाते हुए आखिर में एक सवाल उछाला।
“नहीं, अमिष आउट ऑफ स्टेशन है।”
“वेरी गुड़..तो लग जाओ काम पर”
मीना ने सहमति में सिर हिलाया और केबिन से बाहर हो ली।संजीव ने फोन का रिसीवर उठाकर रश्मि सक्सेना को बुला भेजा।
रात ने नौ बजे थे। रविवार का सन्नाटा और गहरा हो चुका था। मीना और रश्मि दोनों घर जाने को तैयार खड़े थे। उनका दफ़्तर से बाहर निकलना हो ही रहा था कि पाटील सीने से दबाए अख़बार की दो कॉपी एडिटर के केबिन के तरफ़ लिए जा रहा था।
“ए..पाटील.. जस्ट वेट। लेट मी कम एंड सी।” मीना ये कहते हुए पाटील की तरफ़ लपकी। उससे अखबार छीनते हुए एक चैन की सांस ली। आखिरकार..कदम का भंडा फूट चुका था।
लीड हेडलाइन थी-फ़ॉरेस्ट मिनिस्टर कदम खालों के तस्करों का साथी, तीन करोड़ रुपये स्विस बैंक में जमा कराए
इतना ही नहीं, कदम के पीए मोहंती की भी पोल खुल चुकी थी। उसे जिस्मफरोशी के क्षेत्र में सफेदपोश दलाल बताया गया था, जिसकी बीवी भी उसके इस धंधे में बराबर की भागीदार थी।
खबर पढ़ने के बाद मीना मुस्करायी और दफ़्तर से बाहर हो ली।

Monday, July 11, 2005

भाग चार : अमिष की कशिश

मीना ने दरवाजे में चाबी लगाई तो वो घुमी ही नहीं। दरअसल, दरवाजा पहले से ही खुला हुआ था। मीना ने धीरे से दरवाजे को धक्का दे दिया। मेज पर खाली पड़ी बीयर की दो बोतलें और पिज़्जा का डिब्बा गवाही दे रहे थे कि अमिष घर पहुंच चुका है। मीना ने अमिष को पुकारा लेकिन कोई जवाब नहीं आया। उसने दरवाजा भीतर से बंद कर दिया और कूड़ा उठाकर डस्टबिन में फेंक दिया। " कहां चला गया अमिष। ये भी नहीं सोचा कि दरवाजा बाहर से लॉक करके जाए। उसकी आदत नहीं सुधरेगी।" मीना ने बुदबुदाया और रसोई में चाय बनाने पहुंच गई।
मीना ने चाय चढ़ाई ही थी कि कमर पर नर्म-ठंडे हाथों की सरसराहट से वो चौंक गई। वो कुछ समझ पाती, तब तक उसकी गर्दन अमिष के बोसों का स्वाद चख चुकी थी। अमिष ने गैस बंद की और मीना को गोद में उठा लिया।" तुम कहां से आ गए? तुम घर में तो नहीं थे?" मीना ने आश्चर्य से पूछा।" डार्लिंग-हमारा घर तुम्हारा दिल है,इसलिए घर से बाहर जाने का तो सवाल ही नहीं उठता। जहां तक इस ईंट के घर में होने की बात है तो मोहतरमा आपके दिल का राजा बाथरुम में बाथटम में आराम फ़रमा रहा था।" इतना कहते हुए अमिष ने मीना को बेडरुम के अपने डबलबैड पर पटक दिया।
"सुबह-सुबह तुम्हारे इरादे ठीक नहीं दिख रहे मुझे। इतनी दूर से आए हो, थके नहीं हो ?" मीना ने अपने दिलकश अंदाज़ में अमिष की तरफ़ सवाल उछाला।
"हां,थका तो बहुत हूं लेकिन थकान उतारने के लिए जो रम पीना है,उसका नाम मीना है।" अमिष ने भी उसी अंदाज़ में जवाब देते हुए मीना के होंठों से अपने होंठ लगा दिए।
दिन के 11 बज चुके थे। रविवार का दिन था। अपार्टमेंट में कोई हलचल नहीं। लोग अपने अपने घरों में आराम फ़रमा रहे थे और मीना-अमिष मदहोश से लबों के जाम पी रहे थे।
दरअसल, अमिष और मीना के रिश्ते में एक खास बात थी। वो ये कि दोनों के बीच में प्यार शायद उतना नहीं था, जितना वो दावा करते थे लेकिन एक-दूसरे को पाने की तड़प बराबर थी। एक-दूसरे से मिलने पर जिस्म जिस तरह एक होते थे, उतने शायद कई नए जोड़े पहली रात में भी नहीं होते।ये तड़प अमिष की नई नौकरी के साथ और बढ़ गई थी। अमिष ने पिछले दिनों एक टेलीविजन चैनल -चैनल टू- ज्वाइन किया था।इससे पहले वो भी मीना के साथ इंडियन टाइम्स में ही सब एडिटर के तौर पर काम करता था लेकिन नई जॉब में उसके काम का प्रोफाइल बदल गया था। नयी जॉब में उसे प्रोग्रामिंग टीम में रखा गया था और जल्द ही एक ट्रेवल शो का इंचार्ज बना दिया गया था। इस शो के लिए हर हफ़्ते-दस दिन में उसे आउटडोर शूटिंग के लिए जाना पड़ता था। आमतौर पर अगर रिपोर्टर रिपोर्ट नहीं भेजता, तो वो ही रिपोर्टर, वो ही प्रोड्यूसर। कभी-कभार ऐसा होता कि उसके साथ कोई एंकर भी होता,नहीं तो पूरा ट्रेवल शो वन मैन शो ही था। इस बार भी अमिष 15 दिनों की शूटिंग के बाद अंडमान से लौटा था, लिहाज़ा..............वो तो होना ही था, जो दोनों चाहते थे।

Saturday, July 02, 2005

भाग तीन : दिल्ली फ़िल्म पत्रकारिता का राजा

दिल्ली में रविवार का दिन कितना सुकून भरा होता है, ये बात वहां के पत्रकार खूब जानते हैं। इसलिए नहीं कि रविवार छुट्टी का दिन है या सरकारी विभागों से ख़बरें नहीं निकलतीं बल्कि इसलिए क्योंकि रविवार को ट्रैफिक नहीं होता। दरअसल,छुट्टी का दिन होने की वज़ह से सुबह के वक्त दफ़्तर और शाम को वक्त से घर पहुंचा जा सकता है। वरना,दूसरे दिनों में तो सड़क पर ट्रैफिक का हाल कुछ ऐसा होता मानो महाभारत के युद्ध के दौरान कुरुक्षेत्र में कोई कुत्ता फंस गया हो। इधर से तीर,उधर से भाला....जाए तो जाए कहां साला। आम दिनों में महाभारत युद्ध सरीखे ट्रैफिक के बीच अपनी गाड़ी चलाने में आराम नहीं मिलता बल्कि हराम हो जाता है। लेकिन, संडे को छुट्टे निकल लो किसी भी दिशा में.....।
"इंडियन टाइम्स" के दफ़्तर से शाम को निकलते वक्त खाली सड़क को देखकर कुल्लू ने चैन की सांस ली। कुल्लू यानि कुलदीप कुमार। इंडियन टाइम्स के दिल्ली के दफ़्तर से फ़िल्म से जुड़ी जितनी भी खबरें निकलती थी, कुल्लू की कलम की ही देन होती थीं। पिछले ही दिनों उसने शिल्पा शेट्टी की शादी की ख़बर ब्रेक की थी...वो भी दिल्ली में बैठे बैठे।
कुल्लू ने खाली चमकती सड़क को मल्लिका के उरोजों सा निहारा और अपनी सेट्रों दौड़ा दी ली मेरेडियन की तरफ। आज मल्लिका से उसका एक्सक्लूसिव इंडरव्यू तय जो था। कुल्लू के लिए ये कोई नयी बात नहीं थी लेकिन उसने मन ही मन सोच रखा था कि मल्लिका की ऐसी टांग खीचेंगा कि वो ज़िन्दगी भर किसी को एक्सक्लूसिव इंटरव्यू नहीं देगी। मज़े की बात ये कि कुल्लू की ये खीज़ मल्लिका के किसी सीन की वज़ह से नहीं थी बल्कि इसलिए थी क्योंकि एक साल पहले मल्लिका ने उसे इंटरव्यू देने से इंकार कर दिया था। उस वक्त कुल्लू "मरघट की भूमि" नाम के एक क्राइम वीकली में था। कुल्लू ने जैसे ही अपने अखबार का नाम बताया था, मल्लिका एक ज़रुरी काम का बहाना बताकर बाहर निकल गई थी।
....हुंह। कुल्लू ने लंबी आंह भरी और ली मेरिडिन के लांज में दाखिल हो गया। "वेयर इज़ मल्लिका स्टेयिंग" कुल्लू ने रिसेप्शन पर पूछा और जवाब पाकर रुम नंबर 333 की तरफ बढ़ गया। दरवाजा खटखटाते ही....मल्लिका के पीए ने दरवाजा खोला।
" हाई..आई एम कुलदीप कुमार फ्रॉम इंडियन टाइम्स"। कुलदीप ने अपना परिचय दिया।
"यस यस..कम कम..।मैडम इज़ इगरली वेटिंग फॉर यू।" पीए ने ये कहते हुए कुलदीप को सूट के बाहर के कमरे में बैठने का इशारा कर दिया।

Thursday, June 23, 2005

भाग दो : यादों के झरोंके से

मीना आज अरसे बाद ऐसे वक़्त घर पहुंची, जब सूरज की खूबसूरत किरणे अपनी पूरी सुंदरता के साथ घर की खिड़कियों से झांक रही थीं। मीना ने सोफ़े पर बैग पटका और बालकनी का दरवाज़ा खोल दिया। उसने पहले कुछ पल तो सूरज की आंखों में झांका और फ़िर मन ही मन कहा- "देखों, मैं तुम्हें भूली नहीं हूं।" दरअसल, मीना भोर के इस नज़ारे को देखकर कुछ देर तक पुरानी यादों में खो गई थी। कॉलेज के दिनों में कैसे मां सुबह सुबह पढ़ने के लिए जगा दिया करती थी और कैसे पापा ने सुबह की चाय के समय अख़बार पढ़ने की आदत डलवाई, मीना के सामने ऐसी कई यादें फ्लैशबैक की तरह घूम गई। उसने अपने लिए चाय बनाई और अख़बार की सुर्खियों पर नज़र डाली और फ़िर एक बार सूरज की आंख में आंख डालने की हिमाकत कर डाली।ले किन,तब तक सूरज की तपिश चेहरे को जलाने लगी थीं।मीना अपने इस खेल पर एक पल को मुस्कुरायी। फिर अचानक उसे अपनी वो कविता याद आ गई, जो उसने पापा के चौथे मंज़िल के घर की छत पर एक दिन सूरज को देखकर ही लिखी थी।उसने कोशिश की कि शायद उस कविता की दो चार लाइन याद आ जाएं।
"अपनी चौथी मंज़िल के घर पर
मैं जब सूरज की किरणों का साक्षात्कार करती हूं
मद्धम-शीतल हवा का स्पर्श करती हूं
तो पाती हूं
कि इस महानगरीय जीवन में अभी भी कुछ क्षण आरामदायक हैं..
किन्तु
क्या ये पल मुझे सदैव सुखद अनुभूतियां देते रहेंगे
या
कुछ वर्षों बाद
मुझे ऐसे पलों को खोजने के लिए
किसी बीसवीं मंज़िल का घर खोजना होगा।"
हां..शायद कुछ ऐसी ही थी कविता....मीना मन ही मन बुदबुदायी। दरअसल,आठ-दस साल में मीना की ज़िंदगी बहुत बदल चुकी थी। कॉलेज की छात्रा से वो मशहूर ज़र्नलिस्ट का सफ़र तय कर चुकी थी। शर्माने-सुकचाने वाली मीना अपने परिचितों के बीच बोल्ड माने जाने लगी थी। मां-बाप का घर छूट चुका था और वो चौथे मंज़िल के घर से 12वीं मंजिल के घर पहुंच चुकी थी। वो भी दुखद यादों के साथ। मीना ने अमिष के साथ प्रेम विवाह किया था। लेकिन...मीना के मां-बाप को सिर्फ इसी बात पर एतराज़ नहीं था। अमिष दूसरी जाति का तो था ही, साथ ही मीना से उम्र में भी ढ़ाई साल छोटा था। इसके अलावा,शादी के वक्त उसकी नौकरी भी कोई खास बढ़िया नहीं थी।मीना और अमिष ने जिस वक्त शादी का फ़ैसला किया, दोनों की तनख्वाह़ में करीब आधे का अंतर था।
इन यादों ने सुबह सुबह ही मीना की आंखों नम कर दी। वो शायद रो भी देती लेकिन तभी मोबाइल फोन की घंटी बज उठी। मीना ने फोन उठाया तो आवाज़ आयी- " हाय डार्लिंग....आई एम कमिंग।"

Thursday, June 16, 2005

भाग-1 (मीना ठाकुर : नामचीन नाज़नीन)

सूरज की तपिश बाहर भले ही अंगारे बरसा रही थी लेकिन “इंडियन टाइम्स ” के दफ़्तर के भीतर अचानक मौसम बेहद खुशगवार हो उठा था। कई चेहरों पर मुस्कान खिल उठी और कई नज़रों में लौ जल पड़ी।... और फ़िज़ा महक उठी एक शानदार खुशबू से।बदली रंगत को देखकर “समझदार” लोग समझ गए कि मीना ठाकुर ऑफिस पहुंच चुकी हैं।
मीना ठाकुर पेशे से तो पत्रकार थी लेकिन उसमें अदाएं ऐसी कि फिल्मी हीरोइनें भी मात खा जाएँ। दरअसल, मीना में ये अदाएं यूं हीं नहीं थीं। उसकी पेड़ सी लंबाई, जिसके तने से लिपटी काली ज़ुल्फ़ें.....रंग सांवला लेकिन उनमें भी अजीब सी कशिश...। किसी शायर के लिए वो पूरी एक नज़्म सी और दफ़्तर के लोगों के लिए- जबरदस्त सेक्सी।
“गुड मॉर्ऩिंग पाटील, हाऊ आर यू डुइंग। क्या ख़बर है आज ? ”
“कुछ खास नहीं” पाटील ने लगभग सकपकाते हुए जवाब दिया।दरअसल,पाटील को कतई अंदाज़ नहीं था कि उसके ख़्वाबों की हसीना अचानक कोने में बैठे उस अंजान से शख्स से इस तरह कोई सवाल करेगी।
मीना ठाकुर ने पाटील से सवाल किया और सीधे पास बने एडिटर के केबिन में घुस गई।
“यस बॉस- कोई खास असाइनमेंट मुझ नाचीज़ के लिए” मीना ने आँखों में शरारत और होठों पर मादकता लिए अपने दिलकश अंदाज़ में एडिटर संजीव श्रीवास्तव से पूछा।
“नो डियर । खास असाइनमेंट होता है तो बंदा खुद तुम्हारे दरवाजे पहुंच जाता है।” संजीव ने भी उसी शरारत से जवाब दिया।
“बट सिट डाउन। आई हैव एन इंटरेस्टिंग असाइनमेंट फॉर यू।मुझे पता लगा है कि फॉरेस्ट मिनिस्टर पी.के.कदम का अपने पी.ए की बीबी से चक्कर चल रहा है।लेकिन..दिलचस्प बात ये है कि कदम के पी.ए शेखर मोहंती को न केवल इस गड़बड़झाले की खबर है बल्कि वो जानबूझकर अपनी बीबी को मंत्री के आगे परोस रहा है।वो भी अपने किसी फायदे के लिए नहीं बल्कि किसी और के कहने पर।मैं चाहता हूं तुम पता लगाओ....क्या मामला है। बड़ा स्कूप बन सकता है यह।”
“यस बॉस-आई विल ट्राई”। ये कहते हुए मीना केबिन से बाहर निकल गई।